धर्म एवं साधनाविहीन व्यक्तियोंको वृद्धावस्थामें सन्तानोंसे मिलता है अधिक दुःख !


कुछ दिवस पूर्व एक सेवानिवृत्त व्यक्ति हमारे सत्संगमें आए थे । सत्संग समाप्त होनेपर वे अपने पुत्रसे कैसे त्रस्त हैं ?, यह बताने लगे । मैं उनसे पूछा, “क्या आप साधना करते हैं ?”, तो उन्होंने कहा कि मुझे अपने चाकरीसे (नौकरीसे) कभी समय ही नहीं मिला !
जो कहते हैं कि साधना करने हेतु समय नहीं मिला, वस्तुत: उन्हें साधनामें रुचि ही नहीं होती है या उसका महत्त्व ज्ञात नहीं होता । यदि आप युवावस्थामें साधना नहीं कर पाते हैं, उसके लिए समय नहीं निकाल पाते हैं तो वृद्धावस्थामें आपकी सन्तानोंसे आपको कष्ट होनेकी ९० % सम्भावनाएं हैं ! साधना और धर्मपालन सुखी जीवनकी कुंजी है; इसलिए बाल्यकालसे ही साधना करें एवं अपनी सन्तानोंको भी करवाएं  ।



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