जून १, २०१९
केन्द्रमें मोदी शासनका कार्यकाल आरम्भ होनेके पश्चात अब नई शिक्षा नीतिके प्रारुपपर कामकाज आरम्भ हो गया है । नए एचआरडी मन्त्री रमेश पोखरियाल निशंकके पद सम्भालनेके कुछ समय पश्चात ही नूतन शिक्षा नीति बना रही समितिने इसका प्रारुप सौंपा । इस नीतिकी प्रतीक्षा लगभग दो वर्षसे हो रहा था और अन्ततः यह तैयार होकर मन्त्रालयमें आ गई है । इसमें सबसे अधिक ध्यान भारतीय भाषाओंपर किया गया है । शिक्षा नीतिके लागू होनेसे पहले ही तमिलनाडुमें द्रविड मुनेत्र कझगमके (डीएमकेके) सांसदोंने इसका विरोध आरम्भ कर दिया है ।
तमिलनाडुमें डीएमके राज्यसभा सांसद तिरुचि सिवाने केंद्रको चेतावनी देते हुए कहा कि यदि केंद्र तमिलनाडुके लोगोंपर हिन्दी भाषाको थोपनेका प्रयास करेगा तो प्रदेशके लोग सडकपर उतरकर इसका विरोध करेंगें । तिरुचिने कहा कि शासन यदि हिंदीको अनिवार्य रूपसे पारित करता है तो यह आगमें घी डालने जैसा होगा और प्रदेशके युवा लोग इसके विरुद्ध सडकोंपर उतरकर प्रदर्शन करेंगें । नई शिक्षा नीतिके बारेमें बात करते हुए तिरुचिने कहा कि देशमें हिन्दी भाषी और अहिन्दी भाषी राज्योंको पृथक श्रेणियोंमें रखा गया है । ऐसेमें यदि केन्द्र बलपूर्वक हिंदीको लागू करानेका प्रयास करेगी तो हम इसे रोकनेके लिए हर परिणामका सामना करनेको सज्ज रहेंगें ।
वहीं राजनीतिक दल मक्कल निधि मय्यमके प्रमुख कमल हासनने इसपर कहा है कि शासनने तीन भारतीय भाषाओंको पढानेका प्रस्ताव रखा है । मैंने सभी चलचित्रोंमें कार्य किया है और मैं यह मानता हूं कि हिंदी भाषाको किसी भी व्यक्तिपर थोपना ठीक नही है ।
उल्लेखनीय है कि नूतन शिक्षा नीतिमें कहा गया है कि बच्चोंको प्राथमिक शिक्षासे पूर्वसे लेकर पांचवीं कक्षातक और वैसे आठवींतक मातृभाषामें ही पढाना चाहिए ।
यदि कोई विदेशी भाषा भी पढना और लिखना चाहे तो यह इन तीन भारतीय भाषाओंके अतिरिक्त चौथी भाषाके रूपमें पढाई जाए ।
“तमिलनाडुमें इतने बृहद स्तरपर धर्मान्तरण हुआ है व धर्मकी अधोगति हुई है, लोगोंको शेष भारतसे जानबूझकर भिन्न बताकर विभाजित किया गया, तब ये नेता कुछ नहीं कहे और आज जब राष्ट्रभाषा हिन्दीको अनिवार्य भाषा बनाया जा रहा है तो ये विष उगलते बाहर आ रहे हैं, यह उनकी वास्तविकताका बोध करवा रहा है । हिन्दी इस राष्ट्रकी मुख्य भाषा है तो क्या कमल हासन और तिरुचि भारतके बाहर रहते हैं ? यदि इस राष्ट्रमें रहना है तो अपने बनाए नहीं वरन राष्ट्रके विधानपर ही चलना पडेगा, अब इन नेताओंका यह ज्ञात हो जाना चाहिए और सांसदोंका कार्य देशको एक करनेका होना चाहिए न कि विभाजन करनेका । कश्मीरसे कन्याकुमारी तक एक यह एक अखण्ड भारत है । युवाओंको भाषाके नामपर भडकानेवाले नेतागण दण्डके पात्र हैंं।”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : नभाटा
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