२१ वर्षके पश्चात युवकोंने होना चाहिए आत्मनिर्भर !
आजकल मैंने देखा है कि कुछ युवकोंको चाकरी नहीं मिलती है या वे प्रतिस्पर्धावाले परीक्षामें उत्तीर्ण नहीं होते हैं तो वे वृत्तिहीन (बेरोजगार) होकर घर बैठे रहते हैं , या वे प्रतिस्पर्धा हेतु पढाई कर रहे हैं यह कहकर तीस वर्षकी आयुतक घरपर रहकर अपने पिताके धनपर निर्भर रहते हैं ! इतना ही नहीं, घरपर रहनेपर भी वे गृहकार्यमें भी कोई विशेष सहायता नहीं करते हैं, कुछ युवक तो अपने माता-पितासे वे अपने वस्त्रतक धुलवाते हैं ! ऐसे युवकोंने ध्यान रखना चाहिए कि एक तो पुरुषका इसप्रकार अकर्मण्य होकर बैठना पूर्णत: अनुचित है ! युवकोंने २१ वर्ष पश्चात अपने पिताके धनपर कदापि निर्भर नहीं रहना चाहिए एवं गृह त्यागकर अपने जीविकोपार्जन हेतु प्रयास करना चाहिए ! इस संसारमें जीविकोपार्जनके अनेक मार्ग हैं, उसके अनुसार उन्होंने कुछ तो प्रयास करने ही चाहिए और इसमें माता-पिताका भी कम दोष नहीं होता है, वे भी अपने पुत्रोंके प्रति अति आसक्त होनेके कारण उनके निठ्ठलेपनको झेलते रहते हैं ! उन्होंने भी अपने मनको कठोर कर अपने पुत्रको घरसे दूर जाकर अपने रहनेके व्यवस्था करने हेतु कहना चाहिए ! यह मैं क्यों बता रही हूं क्योंकि अब यह एक आम समस्या हो गयी है !
और युवकोंने ध्यान रखना चाहिए कि यदि किसी कारण आप बाहर नहीं जा सकते हैं या आपकेद्वारा अत्यधिक प्रयास करनेपर भी कुछ भी सफलता नहीं मिल रही हो तो कमसे कम घरके कार्यमें हाथ बटायें, अपने वस्त्र इत्यादि उनसे कदापि न धुलवाएं क्योंकि २१ वर्षके पश्चात पुत्रने, अपने माता-पिताको यथाशक्ति सुख देना चाहिए, उनसे कोई सेवा नहीं लेनी चाहिए ! रात्रिमें अपने माता-पिताके पांव दबाने चाहिए, ध्यान रहे, जिनके गुरु नहीं है उनके लिए माता-पिताकी सेवा करना गुरुसेवा ही होता है ! साथ ही यदि पिताजीके कोई पैतृक भूमि हो तो वहां अपने श्रमसे कुछ कार्य आरम्भ करना चाहिए अर्थात कुछ न कुछ मार्ग स्वयंको आत्मनिर्भर बनने हेतु निकालना ही चाहिए ! कमसे कम माता-पितायाको लगे तो सही कि यह मेरा पुत्र आलसी व पराश्रित नहीं है !
इसके साथ ही घरके सभी सदस्योंने योग्य साधना करनी चाहिए जिससे यदि अनिष्ट शक्तियोंके कारण घरके पुरुषके जीविकोपार्जनमें अडचन आ रही हो तो वह दूर हो जाए !
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