साधक क्यों करे स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया ? (भाग – ५)


ईश्वरप्राप्तिके सभी मार्गोंसे गुरुकृपायोगका मार्ग, सर्वश्रेष्ठ योगमार्ग है । इसे ईश्वरप्राप्ति या मोक्ष पानेका लघु पथ (shortcut) भी कहा जा सकता है । गुरुकी कृपा पाने हेतु हमारे श्रीगुरुने अष्टांग योगके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया है और इसके चरण इस प्रकार है – स्वभावदोष निर्मूलन, अहम् निर्मूलन, नामजप, सत्संग, सेवा, त्याग, भाव-जागृति और प्रीति । इन चरणोंपर सहज ही एक दृष्टि डालनेसे यह ज्ञात होता है स्वभावदोष निर्मूलन, यह गुरुकी कृपा पानेका प्रथम चरण है; अतः जो भी जिज्ञासु, साधक, गुरुभक्त या शिष्य गुरुकृपाके अभिलाषी हैं उन्होंने ही इस चरणको त्वरित आरम्भ करना चाहिए । इस चरणको न कर यदि आप नामजप, सत्संग या सेवा करते हैं तो उससे जो भी शक्ति या साधना उत्पन्न होती है, वह दोषों और अहंके कारण निर्माण होनेवाले पापकर्मके क्षालनमें नष्ट हो जाती है । इसीलिए जिज्ञासु, मुमुक्षु और साधकोंने स्वाभावदोष निर्मूलन प्रक्रियाको सातत्यसे करनेका प्रयास करना चाहिए । इस चरण निमित्त प्रमाणिकता एवं सातत्यसे प्रयास करनेवाले साधकोंपर यदि उनके जीवनमें सगुण गुरु अर्थात देहधारी गुरु हैं तो उनकी कृपा आरम्भ हो जाती है एवं यदि देहधारी गुरु किसी साधकके जीवनमें नहीं है तो निर्गुण गुरु अर्थात ईश्वरकी कृपा आरम्भ हो जाती है । मैंने अपने साधनाकालमें यह अनुभव किया है कि साधक यदि अपने भाव या नामजपके कारण कुछ कालके लिए एक अच्छा आध्यात्मिक स्तर साध्य भी कर ले तो भी अपने दोष एवं अहंके कारण या तो उसकी अवनति हो जाती है या वह एक आध्यात्मिक स्तरपर जाकर स्थिर हो जाता है और उसकी आगेकी आध्यात्मिक यात्रा अवरुद्ध हो जाती है । इससे ही इस प्रक्रियाका कितना महत्त्व है, यह ज्ञात होता है । – तनुजा ठाकुर (२७.९.२०१७)



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