ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात् पापस्य कर्मणः ।
यथादर्शतले प्रख्ये पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥
अर्थ : मनु, बृहस्पतिसे कहते हैं : पापकर्मोंका क्षय होनेसे ही मनुष्योंके अन्तःकरणमें ज्ञानका उदय होता है । जैसे स्वच्छ दर्पणमें ही मानव अपने प्रतिबिम्बका दर्शन कर सकता है ।
स्वभावयुक्त्या युक्तस्तु स नित्यं सृजते गुणान् ।
ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं विज्ञेयास्तन्तौवद् गुणाः ॥
अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे कहते हैं : आत्मा अपने स्वरूपमें स्थित रहकर ही सदा गुणोंकी सृष्टि करती है । ठीक उसी प्रकार, जैसे मकडी अपने स्वरूपमें स्थित रहती हुई जाला बनाती है । मकडीके ही समान समस्त गुणोंकी सत्ता समझनी चाहिए ।
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