आपातकालमें देवताको ऐसे करें प्रसन्न ! (भाग-६)


        अन्नपूर्णा कक्षमें प्रसाद बनाने हेतु जो प्रथम और महत्त्वपूर्ण घटक है, वह है ‘अग्नि’, अतः हमें अग्निदेवके प्रति कैसा कृतज्ञताका भाव रखना है ?, वह हम आपको बता ही चुके हैं । आज आपको एक दूसरे महत्त्वपूर्ण घटकके विषयमें बताती हूं, जिसके प्रति हमारा योग्य दृष्टिकोण होना अति आवश्यक है और वह है प्रसाद बनाने हेतु उपयोगमें लानेवाले पात्रके विषयमें ।
 सर्वप्रथम आप जिस पात्रमें (बर्तनमें) अपने नित्यका प्रसाद (भोजन) पकाते हैं उसे स्वच्छ रखें । मैंने अनेक घरोंमें देखा है कि प्रसाद बनानेका पात्र पीछेसे बहुत ही अस्वच्छ होता है । आजकल तो गैसकी अंगीठी होती हैं तो भी यदि आपके पात्र अस्वच्छ रहते हैं तो समझ लें कि आपके बनाए पात्रमें देवता कभी भी प्रसाद ग्रहण नहीं करेंगे । इसलिए उसे व्यवस्थित स्वच्छ किया करें ! मैंने कितने ही घरोंमें प्रसाद बनानेका पात्र बहुत पुराना हो चुका, टूटा, अनेक ‘दाग’ लगा हुआ पाया है अर्थात वे कभी-कभी तो इतने अस्वच्छ होते हैं कि एक बार देख लें तो आपको भोजन करनेकी इच्छा ही समाप्त हो जाए । यह सब मुख्यतः घरवालोंके आलस्य या गृहकार्य करनेवाली सेविकापर ध्यान न देनेके कारण होता है  ।
दूसरी बात ध्यान रखें कि प्रसाद बनानेवाले पात्रमें, विशेषकर जिसे आप अंगीठीपर चढाते हैं, उसमें कभी भी प्रसाद न खाएं अर्थात उस पात्रमें न खाएं  ! इससे भी वह पात्र अशुद्ध होता है एवं अग्निसे आवश्यक  सूक्ष्म अग्नि तत्त्व ग्रहण नहीं कर पाता है; इसलिए आपने देखा होगा यदि हम कभी भी उसमें कुछ लेकर खाने लगते थे तो हमारी माताजी, या दादी या नानी हमें त्वरित टोकती थीं !


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