बाढे पूत पिताके कर्मे (भाग – ३)


जान बूझकर किया गया पाप-कर्म होता है, अक्षम्य पाप !

अपनी आनेवाली पीढीको सर्व सुख-सुविधा मिले, इस हेतु आज अनेक पालक (माता-पिता, आज स्त्रियां भी भ्रष्टाचार करनेमें पीछे नहीं हैं) भ्रष्टाचार करते हैं, उन्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि अधर्मका आधार लेकर एकत्रित किया गया धन, कभी भी किसीको सुख नहीं दे सकता है; इसके विपरीत ऐसा करनेसे वे अपने वंशजोंके पास अपने पापकर्मकी थाती छोडकर जाते हैं, जिसे उन्हें भोगना ही पडता है ! जिन्हें ऐसा लगता है कि मैं तो छोटे प्रमाणमें भ्रष्टाचार करता हूं या मुझसे यह अनजानेमें हो रहा था, उन्होंने इस शास्त्रवचनका अवश्य ही अवलोकन करना चाहिए –

अथ चेद् बुद्धिजं कृत्वा ब्रूयुस्ते तदबुद्धिजम् । पापान् स्वल्पेऽपि तान् हन्यादपराधे तथानृजून् ॥

अर्थ : अब यदि बुद्धिसे सोच-समझकर अपराध करनेके पश्चात वे तुमसे कहें कि ऐसा अनजानेमें हो गया है, तो ऐसे मिथ्याचारियोंको छोटे अपराधके लिए भी दण्डित किया जाना चाहिए ।

 यदि ऐसे भ्रष्ट व्यक्ति स्वयं अपने पापोंका प्रायश्चित नहीं करते हैं या शासन तन्त्र किसी भी कारणवश उन्हें दण्डित नहीं करता है तो ईश्वर उन्हें दण्ड अवश्य ही देते हैं; क्योंकि ईश्वर निर्मित यह सृष्टि कर्मफल सिद्धान्तपर चलती है और चित्रगुप्त देवता किसीके भी कर्मको न तो लिखनेमें चूक करते हैं और न ही उसका फलादेश देनेमें; अतः कर्तव्यनिष्ठ बनें । जिसप्रकार आपकेद्वारा निर्माण किया हुआ घर आपकी सन्तानोंको स्वतः ही प्राप्त हो जाता है, उसीप्रकार आपकेद्वारा निर्मित पापकर्मका परिणाम भी उन्हें शास्त्र अनुसार २५ % तो भोगना ही पडता है ! क्या आप चाहेंगे कि आपके बच्चे आपकेद्वारा जान बूझकर किए गए पापोंका फल भोगें ? जी हां, उनके सुख हेतु जब आप भ्रष्टाचार करते हैं तो आपको यह तो ज्ञात ही होता है कि यह कर्म जो मैं कर रहा हूं, वह अधर्म है, अनुचित है और जान–बूझकर मोहसे आवेशित होकर किया गया पापकर्म ‘अधर्म’ होता है और उसका फल भोगते समय आपको और आपकी सन्तानोंको निश्चित ही पीडा होगी; अतः कर्मनिष्ठ, धर्मनिष्ठ व राष्ट्रनिष्ठ बनें । पापियोंका कुलनाश दो-तीन पीढीके पश्चात होना निश्चित होता है; यदि आपकी यह इच्छा है कि आपका वंश अबाधित चलता रहे तो धर्मके मार्गका अनुसरण करें !  – तनुजा ठाकुर



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