गृहस्थ दम्पत्ति बालकोंको सन्तोंके आश्रम ले जाकर सेवा करें !


गृहस्थो ! अपने बच्चोंको संस्कारित करने हेतु उनके विद्यालयीन अवकाशके समय उन्हें साथ लेकर किसी सन्तके आश्रममें जाकर सेवा करें, इससे आपकी सन्तानोंमें दिव्य गुण आत्मसात होंगे । आश्रम जीवनको कुछ भी यदि वर्षमें अंगीकृत किया जाए तो बच्चोंमें वे गुण आ जाते हैं, जिसे आप चाहकर भी आत्मसात नहीं कर पाते हैं ।
आश्रममें आकर सेवा करनेसे बच्चोंमें सेवाभाव, प्रेमभाव, राष्ट्र व धर्मके प्रति त्याग और धर्माभिमान जागृत होता है ! साधना तो वे सबको देखकर ही सीख जाते हैं और आपको अपनी गुरुकी आज्ञापालन करते देख उनमें भी आज्ञाधारकताका गुण आता है !
कुछ माता-पिता सोचते हैं कि बच्चे प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओंकी पूर्वसिद्धता कर रहे हैं अतः उनका किसी भी प्रकारसे ध्यान भंग नहीं करना चाहिए । ऐसे सभी माता-पिताको बता दें कि यदि आपके घरमें पितृदोषका प्रमाण अधिक होगा तो ऐसेमें उनकी प्रतिस्पर्धामें चुने जानेकी सम्भावना मात्र १० से ३० प्रतिशत होती है और वैसे भी यदि घरमें या कुलमें आध्यात्मिक कष्ट न हो तो भी प्रतिस्पर्धामें चुने जाने हेतु ६५ % प्रारब्ध और ३५ % क्रियामान कर्म उत्तरदायी होता है । प्रारब्द्धकी तीव्रता मात्र साधना, सेवा एवं गुरुकृपासे न्यून हो सकती है या सुसह्य हो सकती है; अतः आप कितनी भी सुविधा दे दें, प्रराब्द्धकी तीव्रता अपने बच्चोंकी कम करनेकी आपमें क्षमता नहीं होती है; इसलिए बच्चोंमें योग्य संस्कार डालकर आध्यात्मिक पालक बनें ! इस हेतु उन्हें सेवा करने हेतु प्रोत्साहित करें और यह तभी होगा जब आप स्वयं समय-समयपर आश्रममें जाकर सेवा देंगे ! बच्चे अनुकरणप्रिय होते हैं, उनमें संस्कार डालने हेतु योग्य आचरण करें ।


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