भगवान श्रीकृष्णको जिन सोलह कलाओंसे परिपूर्ण कहा जाता है, वे कलाएं कौनसी हैं ?


प्रभु श्रीराम १२ कलाओंके ज्ञाता थे, वहीं भगवान श्रीकृष्ण सभी १६ कलाओंके ज्ञाता थे । चन्द्रमाकी १६ कलाएं होती हैं तथा ब्रह्म अर्थात स्वयं ईश्वर, १६ कलाओंसे युक्त होते हैं; किन्तु भगवान शिव ६४ कलाओंमें पारङ्गत हैं अर्थात उन्हें ६४ कलाओंका पूर्ण ज्ञान है ।

सामान्यतः एक मनुष्यके पास ५ कलाएंतक होती हैं, यदि उसे उनका ज्ञान एवं भान हो, तब ठीक है ।

भगवान श्रीकृष्ण सोलह कलाओंसे युक्त थे । वे जिन सोलह कलाओंको धारण करते थे, उनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है । भगवान श्रीकृष्णकी ये १६ कलाएं अल्प अथवा अधिक मात्रामें प्रत्येक व्यक्तिमें होती हैं ।

कला १. श्री सम्पदा
‘श्री’ कलासे सम्पन्न व्यक्तिके पास लक्ष्मीका स्थायी निवास होता है । ऐसा व्यक्ति आत्मिक रूपसे धनवान होता है । ऐसे व्यक्तिके पाससे कोई रिक्त हाथ लौटता नहीं है । इस कलासे सम्पन्न व्यक्ति ऐश्वर्यपूर्ण जीवनयापन करता है ।

कला २. भू सम्पदा
जिसके अन्दर पृथ्वीपर राज करनेकी क्षमता हो तथा जो पृथ्वीके एक बडे भू-भागका स्वामी हो, वह ‘भू’ कलासे सम्पन्न माना जाता है ।

कला ३. कीर्ति सम्पदा
‘कीर्ति’ कलासे सम्पन्न व्यक्तिका नाम समस्त ब्रह्माण्डमें आदर-सम्मानके साथ लिया जाता है । ऐसे लोगोंकी विश्वसनीयता होती है एवं वह लोककल्याणके कार्योंमें बढ-चढकर सहभागी होते हैं ।

कला ४. वाणी सम्मोहन
‘वाणी’में सम्मोहन भी एक कला है । इससे सम्पन्न व्यक्तिकी वाणी सुनते ही सामनेवालेका क्रोध शान्त हो जाता है । मनमें प्रेम एवं भक्तिकी भावना भर उठती है ।

कला ५. लीला
पांचवीं कलाका नाम है, लीला । इससे सम्पन्न व्यक्तिके दर्शन मात्रसे आनन्द मिलता है एवं वह जीवनको ईश्वरके प्रसादके रूपमें ग्रहण करता है ।

कला ६. कान्ति
जिसके रूपको देखकर मन स्वतः ही आकर्षित हो जाता हो, जिसके मुखमण्डलको बारम्बार निहारनेकी इच्छा हो, वह ‘कान्ति’ कलासे सम्पन्न होता है ।

कला ७. विद्या
सातवीं कलाका नाम विद्या’ है । इससे सम्पन्न व्यक्ति वेद-वेदाङ्गके साथ ही युद्घ, सङ्गीत कला, राजनीति एवं कूटनीतिमें भी सिद्घहस्त होते हैं ।

कला ८. विमला
जिसके मनसमें किसी प्रकारका छल-कपट नहीं हो तथा जो सभीके प्रति समान व्यवहार रखता हो, वह ‘विमला’ कलासे सम्पन्न माना जाता है ।

कला ९. उत्कर्षिणि शक्ति
इस कलासे सम्पन्न व्यक्तिमें लोगोंको कर्म करने हेतु प्रेरित करनेकी क्षमता होती है । ऐसे व्यक्तिमें इतनी क्षमता होती है कि वह लोगोंको किसी विशेष लक्ष्यकी प्राप्ति हेतु प्रेरित कर सकता है ।

कला १०. नीर-क्षीर विवेक
इससे सम्पन्न व्यक्तिमें विवेकशीलता होती है । ऐसा व्यक्ति अपने विवेकसे लोगोंका मार्ग प्रशस्त कर सकनेमें सक्षम होता है ।

कला ११. कर्मण्यता
इस कलासे सम्पन्न व्यक्तिमें स्वयं कर्म करनेकी क्षमता तो होती ही है, वह लोगोंको भी कर्म करनेकी प्रेरणा दे सकता है एवं उन्हें सफल बना सकता है ।

कला १२. योगशक्ति
इस कलासे सम्पन्न व्यक्तिमें मनको वशमें करनेकी क्षमता होती है । वह मन एवं आत्माका भेद मिटाकर योगकी उच्च सीमा पा लेता है ।

कला १३. विनय
इस कलासे सम्पन्न व्यक्तिमें नम्रता होती है । ऐसे व्यक्तिको अहङ्कार छू भी नहीं पाता । वह सभी विद्याओंमें पारङ्गत होते हुए भी गर्वहीन होता है ।

कला १४. सत्य-धारणा
इस कलासे सम्पन्न व्यक्तिमें कोमल अथवा कठोर, सभी प्रकारके सत्योंको धारण करनेकी क्षमता होती है । ऐसा व्यक्ति सत्यवादी होता है तथा जनहित एवं धर्मकी रक्षा हेतु कटु सत्य बोलनेसे भी सङ्कोच नहीं करता ।

कला १५. आधिपत्य
इस कलासे सम्पन्न व्यक्तिमें लोगोंपर अपना प्रभाव स्थापित करनेका गुण होता है । आवश्यकता पडनेपर वह लोगोंको अपने प्रभावकी अनुभूति करवानेमें सफल होता है ।

कला १६. अनुग्रह क्षमता
इस कलासे सम्पन्न व्यक्तिमें किसीका कल्याण करनेकी प्रवृत्ति होती है । वह प्रत्युपकारकी भावनासे सञ्चालित होता है । ऐसे व्यक्तिके समीप जो भी आता है, वह अपनी क्षमताके अनुसार अवश्य उसकी सहायता करता है ।



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