ख्रिस्ताब्द २००९ में एक बार धर्मप्रसारके मध्य मैं झारखण्डके एक ग्राममें देवालयकी (मन्दिरकी) स्वच्छताकी सेवा कुछ बाल एवं युवा साधकोंके साथ कर रही थी । सेवा समाप्त होनेवाली थी कि अकस्मात मुझे कुछ आवश्यक कार्यसे दस मिनिटके लिए उस प्रांगणसे बाहर जाना पडा । जब मैं देवालयमें वापस आई तो सभी साधक सेवा समाप्त कर हाथ-पांव धो रहे थे | मैंने देखा कि देवालयके निकट एक खेतमें सभीने देवालयसे कचरेको फेंक दिया था और उस खेतमें आलूके पौधे लगे हुए थे ! हरे-भरे पौधोंपर उन सबकेद्वारा गंदगीको फेंका हुआ देख, मुझे बहुत दुःख हुआ, मैंने सभीको बुलाया और पूछा, “यह खेत किसका है तो उन्होंने गांवके के कृषकका नाम बताया जिन्हें मैं नहीं जाती थी !” मैंने उनसे पूछा , “यदि यह खेत आपका होता तो क्या आप ऐसा करते” ? यह सुनकर सबने अपना सिर लज्जासे झुका ली ! मैंने उनसे कहा, “अपना घर स्वच्छ कर दूसरोंके स्थानको अस्वच्छ करनेका अर्थ है कि आपमें दूसरोंका विचार करना यह सामान्यसा गुण नहीं है, क्या आपको विद्यालयमें यह नहीं सिखाया गया है ?” एक छोटा सा दस वर्षका नटखट बालक बोल पडा, “पता है दीदी, जैसे आप हमें ये सब दृष्टिकोण देती हैं न वैसे हमारे शिक्षक हमें नहीं सिखाते हैं अन्यथा हम ऐसे थोडे ही करते !” मैंने उससे कहा, “किन्तु इसमें सिखाना क्या है ? यह तो सामान्य ज्ञान है !” तो उसने कहा, “यही तो नहीं सिखाया जाता है हमें, हमें सामान्य ज्ञानमें चीनकी राजधानी क्या है यह सिखाया जाता है; इसलिए हम आपके पास आते हैं, हमें बहुत कुछ सीखनेको मिलता है !”
वस्तुत: आजके विद्यार्थीको विद्यालयमें या पाठ्यक्रमोंमें, व्यावहारिक सामान्य ज्ञानकी शिक्षा नहीं दी जाती है और बच्चों को ‘रटन्तु तोता’ बनाया जाता है, व्यवहार या समाजमें रहने हेतु सामान्य गुण जैसे दूसरोंका विचार करना यह गुण, आत्मसात ही नहीं करवाया जाता है ! पूर्व कालमें संयुक्त परिवार हुआ करता था इससे भी यह गुण स्वत: ही बच्चे दूसरोंको देखकर सीख जाते थे; आजकलकी एकल परिवार व्यवस्थामें ‘हम दो हमारे दो’ और अब तो ‘हम दो हमारे एक’, इस वयवस्थाने स्वार्थके दुर्गुणको बच्चोंमें कूट-कूट कर भर दिया है ! इसलिए वैदिक गुरुकुलकी आवश्यकता है, इसमें विद्यार्थी गुरुकुलमें ही कुछ वर्ष रहेंगे और एक कुटुंब समान रहते हुए समाज या परिवारमें कैसे दूसरोंका विचार कर कैसे रहना चाहिए, यह वे सीखेंगे और जब वे वहांसे निकलकर सामजमें या गृहस्थ जीवनमें जायेंगे तो अपने सदवर्तनसे एक स्वस्थ और साधकके भाव युक्त समाजकी रचना करेंगे ! धर्मका एक सरल सिद्धांत है, दूसरोंके जिस वर्तनसे आपको कष्ट होता है वैसा वर्तन आप दूसरोंके साथ न करें ! धर्म न सिखानेके कारण ही आज स्वार्थी जीवोंसे समाजका व्यष्टि और समष्टि जीवन त्रस्त हो गया है; इसलिए धर्मका पोषण करनेवाले वैदिक गुरुकुलोंकी आज भारतमें अत्यधिक आवश्यकता है !
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