कलियुगी कृषककी मूढता, आलूकी उपजके लिए हो रहि मद्यका (शराबका) छिडकाव !!


दिसम्बर २४, २०१८

बुलंदशहर जनपदके किसान आलूकी अधिक उपजके लिए खेतोंमें देशी मद्यका (शराबका) छिडकाव कर रहे हैं ! किसानोंकी मानें तो इससे उपजपर शीतलहरीका प्रकोप नहीं लगता है । आलूकी उपज अधिक होती है और आलूका आकार भी मोटा होता है, जिससे अधिक लाभ होता है, परन्तु इसके सम्बन्धित वैज्ञानिकोंका कहना है कि इसका छिडकाव अनुचित है । इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है ।


बुलंदशहरके शिकारपुर कोतवाली क्षेत्रके गांव बोहिचमें इन दिनोंमें किसान आलूकी अधिक उपज करनेके लिए कीटनाशक दवाओंके साथ साथ मद्यका भी छिडकाव कर रहे हैं । किसानोंका कहना है कि, देशी मद्यसे आलूकी उपजमें वृद्धि होती है और आलू शीघ्र ही पक जाता है । किसान लोकेश कुमारने बताया कि मद्यसे आलूपर कोई असर नहीं पडता है । शीत ऋतुमें अधिक पाला पडनेके कारण ही आलूमें मद्यका छिडकाव किया जाता है ।

ऐसा ही चित्र गांव जमालपुरसे भी आया है । यहां भी किसान अपने आलूकी खेतीमें केवल शराबका ही छिडकाव कर रहे हैं । किसान मांगेरामका कहना है कि, यह काम वो गत कई वर्षोंसे करते चले आ रहे हैं । इससे उनको काफी लाभ है । आलूको खानेसे होने वाली हानिपर किसानने कहा कि, इतनी कम मात्रामें मद्य लगाते हैं, जिससे आलूको खानेसे कोई अन्तर नहीं पडता ।

जिला कृषि रक्षा अधिकारी अमन सिंहने बताया कि, मद्यका छिडकाव अनुचित है । इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, परन्तु किसान भिन्न-भिन्न ढंगसे अपने प्रयोग करता रहता है । किसान मान रहे हैं कि मद्यके छिडकावसे आलू अधिक मोटा हो जाता है; परन्तु किसानोंसे विनती है कि, वह ऐसा न करें ।

 

“पूर्वमें किसानोंद्वारा भूमि, बीज आदिपर संस्कार कर रोपा जाता था व जैविक उर्वरकका उपयोग कर कृषिकी जाती थी, परन्तु कलियुगका असर किसानोंके सिर चढकर भी बोला है । किसानोंको यह भान भी नहीं कि इसी शाकका उपयोग हिन्दू अपने घरोंमें, देवालयोंमें भगवानको भोग लगानेके लिए कलते हैं और ऐसेमें सात्विकता कहां रह जाएगी, स्वास्थ्यका क्या होगा ? क्या केवल लाभ ही सब कुछ है ? स्वाभिमान, अन्योंका सोचना कुछ नहीं ? किसान वर्ग इसपर विचारकरें व केन्द्र भी इसकी समीक्षा कर यह रोकें !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : नभाटा



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