कोमलाङ्गं विशालाक्षं इन्द्रनील समप्रभम् दक्षिणाङ्गे दशरथं पुत्राप्येक्षेण तत्परम् । प्रष्टतो लक्षमणं देवं सछत्रं कनक प्रभम् पार्श्वे भरत शत्रुघ्न चामर व्य्जनान्वितौ अग्रेत्यग्रौ हनूमन्तं रामानुग्रह कांक्षिणम् ।। अर्थ : कोमल अंग वाले , सर्वत्र दैदीप्यमान होनेवाले विशाल नेत्रवाले , जिनके दाहिने ओर दशरथ अपने पुत्रको पूर्ण भक्तिसे देख रहे हैं, जिनके पीछे लक्ष्मण एक स्वर्ण छत्र लिए […]
भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे कर्णावाशाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः । अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवन वपुषं विष्णुमीशं नमामि ।। अर्थ : भगवान विष्णुके सर्वव्यापी स्वरूपको नमन है जिनका देह त्रिभुवन है , जिनके चरण यह पृथ्वी है , जिनकी नाभि गगन है, जिनकी सांसें वायु है, सूर्य और […]
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षिय माऽमृतात् ॥ अर्थ : उन शिवका मैं वंदन करती हूं जो त्रिनेत्र हैं, जो दिव्य सुगंधीयुक्त है जो सबका संगोपन करते हैं ! वे मुझे इस अज्ञानता रूपी मृत्युसे मेरे उद्धार करे जिससे मुझे सत्य और ज्ञानका अमरत्व प्राप्त हो जैसे एक पका हुए खीरा स्वयं ही […]
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् । सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि।। अर्थ : उन परमेश्वर स्वरूपी शिव संग भवानीको मेरा नमन है जिनका वर्ण कर्पूर समान गौर है, जो करुणाके प्रतिमूर्ति हैं, जो सारे जगतके सार हैं, जिन्होंने गलेमें सर्पके हार धारण कर रखे हैं और जो हमारे हृदय रूपी कमलमें सदैव विद्यमान रहते हैं ।
अगजाननपद्मार्कं गजाननमहर्निशम् । अनेकदन्तं भक्तानां एकदन्तमुपास्महे ।। अर्थ : गजके मुखवाले गणपती अपनी पद्मके समान मुखवाली माता पार्वतीके मुखपर तेजसको उत्पन्न करनेवाले, उन एकदंत गणपतिकी मैं पूजन करता हूं जो दिन और रात्रिके स्वामी हैं और भक्तोंका कल्याण करनेवाले हैं ।
करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा । श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधं । विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व । जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ।। अर्थ : हे भगवान शिव, कृपया मेरे हस्त, चरण, वाणी, शरीर या अन्य किसी भी शरीरके कर्म करनेवाले अंगसे या कान, नेत्र या मनसे, जाने-अनजाने हुए सभी अपराधोंको क्षमा करें । हे महादेव, शम्भो […]
तीक्ष्णदंष्ट्र महाकाय कल्पान्तदहनोपम । भैरवाय नमस्तुभ्यमनुज्ञां दातुमर्हसि ।। तीक्ष्ण दंतवाले, विशाल देहवाले, कल्पके अंतमें लय करनेवाले (सृष्टिके अंतमें दहन कर विनाश करनेवाले) हे भैरव ! आपको नमन करनेकी आज्ञा चाहती हूं !
कार्यं मे सिद्धिमायातु प्रसन्ने त्वयि धातरि । विघ्नानि नाशमायान्तु सर्वाणि सुरनायक ।। अर्थ : हे जगकर्ता ! हे देवोंके नायक, आपकी कृपासे मेरे कार्योंको यश प्राप्त हो और सारे विघ्नोंका नाश हो !
प्रार्थना : कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन। जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन॥4॥ – बालकांड , रमचरितमानस भावार्थ:-जिनका कुंद के पुष्प और चन्द्रमा के समान (गौर) शरीर है, जो पार्वतीजी के प्रियतम और दया के धाम हैं और जिनका दीनों पर स्नेह है, वे कामदेव का मर्दन करने वाले (शंकरजी) […]
देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गम् कामदहम् करुणाकरलिङ्गम् । रावणदर्पविनाशनलिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ अर्थ : उस शाश्वत एवं करुणाकर शिवलिंगको मैं प्रणाम करती हूं जिनकी अर्चना देवता, ऋषि-मुनि करते हैं, जिन्होंने कामदेवका दहन किया एवं जिसने रावणके अहंकारको नष्ट किया ।