देवस्तुति

देव स्तुति


जयचन्द्रदिवाकरनेत्रधरेजय  पावकभूषितवक्त्रवरे । जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे ।। अर्थ : हे सूर्य-चन्द्रमारूपी नेत्रोंको धारण करनेवाली देवी, तुम्हारी जय हो ! हे अग्निके समान देदीप्यमान मुखसे शोभित होनेवाली देवी, तुम्हारी जय हो । हे भैरव शरीरमें लीन रहनेवाली और अन्धकासुरका शोषण करनेवाली देवी, तुम्हारी जय हो, जय हो !

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शान्ताकारं   भुजगशयनं   पद्मनाभं   सुरेशं, विश्वाधारं  गगनसदृशं  मेघवर्णं  शुभाङ्गम्  । लक्ष्मीकान्तं  कमलनयनं  योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे  विष्णुं  भवभयहरं  सर्वलोकैकनाथम्  ॥ अर्थ : जिस हरिका रूप अति शान्तिमय है, जो  शेषनागकी शैय्यापर शयन करते हैं, जिनकी नाभिसे कमल निकल रहा है, जो समस्त जगतका आधार है, जो गगनके समान सर्वत्र व्याप्त हैं, जो नीले बादलोंके वर्णके समान हैं, जो […]

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आवाहये   तं  गणराजदेवं  रक्तोत्पलाभासमशेषवन्द्दम्   । विघ्नान्तकं विघ्नहरं गणेशं भजामि रौद्रं सहितं च सिद्धया ॥ अर्थ : जो देवताओंके गणके राजा हैं,  लाल कमलके समान जिनके देहकी आभा है,  जो सबके वन्दनीय हैं, विघ्नके काल हैं,  विघ्नोंको हरनेवाले हैं,  शिवजीके पुत्र हैं,  उन गणेशजीका मैं सिद्धिके साथ आवाहन और भजन करता हूं ।

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यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्णसत्कथा मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम् । प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्य यः पुमान भवेत्स नन्दनन्दने भवे भवे सुभक्तिमान ।।९।। अर्थ : हे कृष्ण, प्रत्येक स्थितिमें ऐसी कृपा करें कि मैं सदा आपकी लीला, कथा, महिमाका वर्णन करता रहूं । जो भी इन अष्टकाद्वयका पाठ करता रहता है, वह कृष्ण भक्तिसे जन्मजन्मान्तरतक […]

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ब्रह्मभ्यो ब्रह्मदात्रे च  गजानन नमोऽस्तु ते ।   आदिपूज्याय ज्येष्ठाय ज्येष्ठराजाय ते नमः ॥  अर्थ : आप ब्राह्मणोंको ब्रह्म (ज्ञान) देते हैं, हे गजानन, आपको नमस्कार है । आप प्रथम पूजनीय, ज्येष्ठ और ज्येष्ठराज हैं, आपको नमस्कार है ।

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गजाननाय महसे प्रत्यूहतिमिरच्छिदे ।  अपारकरुणापूरतरङ्गितदृशे नमः ॥ अर्थ : विघ्नरूप अन्धकारका नाश करनेवाले, अथाह करुणारूप जलराशिसे तरंगित नेत्रोंवाले गणेश नामक ज्योतिपुंजको नमस्कार है ।

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बुद्धिं देहि यशो देहि कवित्वं देहि देहि मे ।  मूढत्वं च हरेद्देवि  त्राहि  मां शरणागतम् ॥ अर्थ : हे देवी ! आप मुझे बुद्धि दें, कीर्ति दें, कवित्वशक्ति दें और मेरी मूढताका नाश करें ! आप मुझ शरणागतकी रक्षा करें !

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मन्दाकिनी सलिल चन्दन चर्चिताय नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।  मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मै ‘म’ काराय नमः शिवायः ॥ अर्थ : चन्दनसे अलंकृत एवं गंगाकी धाराद्वारा शोभायमान नन्दीश्वर एवं प्रमथनाथके स्वामी महेश्वर, आप सदा मन्दार पर्वत एवं बहुदा अन्य स्रोतोंसे प्राप्त पुष्पोंद्वारा पूजित हैं । हे ‘म्’ स्वरूपधारी शिव, आपको नमन है ।

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जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि । जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥ अर्थ : नामोंसे प्रसिद्ध जगदम्बिके, तुम्हें मेरा नमस्कार है ! देवी चामुण्डे, तुम्हारी जय हो ! सम्पूर्ण प्राणियोंकी पीडा हरनेवाली देवी, तुम्हारी जय हो ! सबमें व्याप्त रहनेवाली देवी, तुम्हारी जय हो ! कालरात्रि, तुम्हें नमस्कार हो !

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विष्णुः शरीरग्रहणं अहम ईशान एव ।  कारितास्ते यतोह्तस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान भवेत ॥ अर्थ : हे प्रकृति परमेश्वरी ! भगवान विष्णुको, भगवान शंकरको और मुझे (ब्रह्मा) तुमने ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति करनेकी शक्ति किसमें है ?

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