देवस्तुति

सरस्वती स्तुति


पातु नो निकषग्रावा मतिहेम्न: सरस्वती । प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या ॥ अर्थ : बुद्धिरूपी सोनेके लिए कसौटीके समान सरस्वतीजी, जो केवल वचनसे ही विद्धान् और मूर्खोंकी परीक्षा कर देती है, हमलोगोंका पालन करें ।

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राम स्तुति


श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ अर्थ : मैं एकाग्र मनसे श्रीरामचंद्रजीके चरणोंका स्मरण और वाणीसे गुणगान करता हूं, वाणी द्धारा और पूरी श्रद्धाके साथ भगवान् रामचन्द्रके चरणोंको प्रणाम करता हुआ मैं उनके चरणोंकी शरण लेता हूं |

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सरस्वती स्तुति


सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम् । देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जना: ॥ भावार्थ  : वाणीकी अधिष्ठात्री, उन देवी सरस्वतीको प्रणाम करता हूं, जिनकी कृपा से मनुष्य देवता बन जाता है ।

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गंगा स्तुति


देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे । शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले ।। अर्थ : हे देवी सुरेश्वरी ! भगवती गंगे ! आप तीनों लोकोंको तारने वाली हैं । शुद्ध तरंगोंसे युक्त, महादेव शंकरके मस्तकपर विहार करनेवाली, हे मां ! मेरा मन सदैव आपके चरण कमलोंमें केन्द्रित है ।

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विष्णु स्तुति


पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् । इह संसारे बहु दुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुरारे ॥ अर्थ : बार-बार जन्म, बार-बार मृत्यु, बार-बार  गर्भ में शयन, इस संसारसे पार जा पाना बहुत कठिन है, हे मुरारी, कृपा करके इससे मेरी रक्षा करें ॥

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राम स्तुति


लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् । कारुण्यरुपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥ अर्थ : मैं सम्पूर्ण लोकोंमें सुन्दर तथा रणक्रीडामें धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणाकी मूर्ति और करुणाके भण्डार रुपी श्रीरामकी शरणमें हूं |

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देव स्तुति


लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः । येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ।। अर्थ : जिनके हृदयमें श्याम रंगके पद्म स्वरूपी जनार्दनका वास है, उन्हें सदैव यश (लाभ) मिलता है , उनकी सदैव जय होती है, उनकी पराजय कैसे संभव है ?!

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गणेश स्तुति


प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् | भक्तावासं स्मरेन्नित्यं आयुःकामार्थसिद्धये || अर्थ :- भक्तके हृदयमें वास करनेवाले गौरी पुत्र विनायकको वंदन करनेके पश्चात्, दीर्घायु, सुख-समृद्धि एवं सर्व इच्छा पूर्ति हेतु उनका अखण्ड स्मरण करना चाहिए !

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राम स्तुति


॥ एकश्लोकि रामायणम् ॥ आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनं वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम् । वालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लङ्कापुरीदाहनं पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि रामायणम् ॥ ॥ एकश्लोकि रामायणं सम्पूर्णम् ॥ अर्थ : आरम्भमें प्रभु श्री रामका वनवास गमन, तत्पश्चात् अनुक्रममें स्वर्ण मृगका हनन, सीताका हरण, जटायुका मरण, सुग्रीवसे मित्रता, बालीका संहार, समुद्रका तरण, लंकाका दहन, रावण, कुंभकर्णका  हनन, ये हैं, सम्पूर्ण […]

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देव स्तुति


शारदा शारदाम्भोजवदना वदनाम्बुजे । सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात् ॥ अर्थ : शरत्कालमें उत्पन्न कमलके समान मुखवाली और सब मनोरथोंको देनेवाली , हे शारदा(सरस्वती)! सब सम्पत्तियोंके साथ मेरे मुखमें सदा निवास करें ।

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