देवस्तुति

कृष्ण स्तुति


वृन्दावनेश्वरी राधा कृष्णो वृन्दावनेश्वरः । जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम ॥ अर्थ : श्रीराधारानी वृन्दावनकी स्वामिनी हैं और भगवान श्रीकृष्ण वृन्दावनके स्वामी हैं; इसलिए मेरे जीवनका प्रत्येक क्षण श्रीराधा-कृष्णके आश्रयमें व्यतीत हो !

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देव स्तुति


महत: परित: प्रसर्पतस्तमसो दर्शनभेदिनो भिदे । दिननाथ इव स्वतेजसा हृदयव्योम्नि मनागुदेहि न: ॥ अर्थ : हे शम्भो ! हमारे हृदयरुपी आकाशमें, आप सूर्यके समान अपने तेजसे चारों ओर घिरे हुए, ज्ञानदृष्टिको रोकने वाले, इस अज्ञानके अन्धकारको दूर करनेके लिए प्रकट हो जाएं । सूर्य जिस प्रकार अपने तेज–प्रकाशसे रात्रिजन्य अन्धकारको दूर कर देता है, उसी […]

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देव स्तुति


मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर यत्पूजितं मयादेव परिपूर्णं तदस्तु मे । अपराध सहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया दासोऽयं इति मां मत्वा क्षमस्व पुरुषोत्तम ।। अर्थ : हे देवाधिदेव ! न मन्त्रोंका उच्चारण आता है, न योग्य प्रकारसे कर्मकांडकी कृति(क्रिया) ही कर पाता हूं, न ही भक्ति है, हे प्रभु जब भी मैं आपकी पूजा करूं, आप ही मुझे […]

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कृष्ण स्तुति


कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने । प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः । अर्थ : वासुदेवनन्दन परमात्मा स्वरूपी भगवान श्रीकृष्णको वंदन है, उन गोविंदको पुनः नमन है, वे हमारे कष्टोंका नाश करें !

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राम स्तुति


आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्‌ । लोकाभिरामं श्रीरामं, भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥ अर्थ : मैं इस संसारके प्रिय एवं सुन्दर, उन भगवान रामको बार-बार नमन करता हूं, जो सभी आपदाओंको दूर करनेवाले तथा सुख-सम्पत्ति प्रदान करनेवाले हैं ।

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राम स्तुति


राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सह्स्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ।। अर्थ : भगवान शंकरने माता पार्वतीसे कहा , “हे सुमुखी ! प्रभु श्रीरामका एक बार नाम लेना विष्णुसह्स्रनामका उच्चारण करने समान है; अतः मैं सदैव मनको लुभाने वाले ‘राम राम’का ध्यान करता हूं ।”

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राम स्तुति


नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा । भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥ अर्थ : हे रघुपति ! मैं सत्य कहता हूं यद्यपि आप सबके अंतरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) तथापि  मेरे हृदयमें दूसरी कोई इच्छा नहीं है, हे रघुकुलश्रेष्ठ ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिए […]

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कृष्ण स्तुति


करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम् । वटस्य पत्रास्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ।। अर्थ : वटपत्रके मध्य सोये हुए, अपने हस्तकमलद्वारा पदकमलको मुखकमल प्रवेश कराते हुए, बालक कृष्णको मनसे स्मरण करता हूं ।

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श्रीराम स्तुति


लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌ । कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ।। अर्थ : मैं सम्पूर्ण लोकोंमें सुन्दर तथा रणक्रीडामें धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणाकी मूर्ति और करुणाके भण्डार रुपी श्रीरामकी शरणमें हूं |

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सरस्वती स्तुति


सरस्वति महाभागे विद्ये  कमललोचने । विद्यारूपे विशालाक्षि देहि नमोऽस्तु ते।। अर्थ : हे महाभाग्यवती ज्ञानस्वरूपा कमलके समान विशाल नेत्रवाली ज्ञानदात्री सरस्वती ! मुझे विद्या दो, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं ।

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