देव स्तुति


यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्णसत्कथा मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम् ।
प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्य यः पुमान भवेत्स नन्दनन्दने भवे भवे सुभक्तिमान ।।९।।
अर्थ : हे कृष्ण, प्रत्येक स्थितिमें ऐसी कृपा करें कि मैं सदा आपकी लीला, कथा, महिमाका वर्णन करता रहूं । जो भी इन अष्टकाद्वयका पाठ करता रहता है, वह कृष्ण भक्तिसे जन्मजन्मान्तरतक सम्पन्न रहता है ।


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