गीता सार

पंडित किसे कहते हैं


यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः ॥ श्रीमद भगवदगीता – (४:१९ ) अर्थ: जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्पके होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्निद्वारा भस्म हो गए हैं, उस महापुरुषको ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं ॥ भावार्थ : कर्मका शास्त्रसम्मत होना परम आवश्यक है; अन्यथा कर्मफलके सिद्धान्त […]

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गीता सार


कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ – श्रीमदभगवद्गीता ३:२० अर्थ : जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धिको प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू कर्म करनेके ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है | भावार्थ : कर्मका आसक्तिरहित होना अति आवश्यक है तभी वह […]

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गीता सार


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ – (श्रीमदभगवद्गीता -२.४७) अर्थ : तेरा कर्म करनेमें ही अधिकार है, उसके फलोंमें कभी नहीं । इसलिए तू कर्मोंके फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करनेमें भी आसक्ति न हो ॥ भावार्थ : कर्मयोगका यह एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है जिसके अनुसार निष्काम कर्म करना […]

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गीता सार :


गतसङ्गास्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ – श्रीमदभगवद्गीता (४: २३) अर्थ : जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो देहाभिमान और ममतासे रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्माके ज्ञानमें स्थित रहता है, ऐसा केवल यज्ञसम्पादनके लिए कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म भलीभांति विलीन हो जाते हैं | भावार्थ : […]

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गीता सार :


कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌ । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ – श्रीमदभगवद्गीता(३:६) अर्थ : जो मूढ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियोंको हठपूर्वक ऊपरसे रोककर मनसे उन इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है | भावार्थ : यह श्लोक आजके तथाकथित संतों और सन्यासियोंपर योग्य बैठता है | बाहरसे […]

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यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्‌ । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ – श्री मद्भग्वद्गीता (४:३१) अर्थ : हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। और यज्ञ न करनेवाले पुरुषके लिए तो यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है ? भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण […]

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गीता सार


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ – श्रीमदभगवद गीता ४:७,८ अर्थ : हे भारत ! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूपको रचता हूं अर्थात साकार रूपसे सबके सम्मुख प्रकट होता हूं ॥7॥ […]

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गीता सार :


श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌ ।            स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ – श्रीमदभगवद्गीता (३: ३५) अर्थ : अच्छी प्रकार आचरणमें लाए हुए दूसरेके धर्मसे गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है | भावार्थ : कलियुगके आरंभ होने […]

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गीता सार


द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ श्रीमदभगवद्गीता (४: २८) अर्थ : कई पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करनेवाले हैं, कितने ही तपस्या रूपी यज्ञ करनेवाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करनेवाले हैं,  कुछ स्वाध्याय रूपी ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं तो कितने ही तीक्ष्णव्रतोंको धारण कर साधना करते हैं | भावार्थ : उपर्युक्त श्लोकमें भगवान […]

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यज्ञसे बचे हुए अन्नको ग्रहण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं


यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।          भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्‌ ॥ श्रीमदभगवद्गीता (३:१३) अर्थ : यज्ञसे बचे हुए अन्नको ग्रहण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपने शरीरपोषण के लिए अन्न पकाते हैं, वे तो पापको ही खाते हैं॥ भावार्थ : वैदिक संस्कृतिमें […]

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