देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ अर्थ : तुम लोग इस यज्ञद्वारा देवताओंको उन्नत करो और वे देवता तुम लोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार नि:स्वार्थ भावसे एक दूसरेको उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे | भावार्थ : वैदिक सनातन धर्मके धर्मसिद्धांतोंमें एक सिद्धान्त है परस्पर हितकी […]
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ श्री मदभगवद्गीता (४:२२) अर्थ : जो बिना इच्छाके स्वतः प्राप्त हुए वस्तुओंसे सदा संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्याका सर्वथा अभाव हो गया हो, जो हर्ष-शोक आदि द्वंद्वोंसे सर्वथा अतीत हो गया है- ऐसा सिद्धि और असिद्धिमें सम रहनेवाला कर्मयोगी, कर्म करता हुआ भी उनसे […]
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ (श्रीमदभगवद गीता ३: ४०) अर्थ : इंद्रियोंके वासस्थान हैं मन एवं बुद्धि, यह काम, इन मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा ही ज्ञानको आच्छादित करके जीवात्माको मोहित करता है । भावार्थ : साधना अर्थात मन, बुद्धि एवं अहंका लय करना | एक बार यह साध्य हो जाये तो व्यक्तिको […]
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ – श्रीमदभगवद्गीता (५:२५) अर्थ : जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञानद्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभावसे परमात्मामें स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्मको प्राप्त होते हैं | भावार्थ : […]
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ – श्रीमदभगवद्गीता (४: ३४) अर्थ : उस ज्ञानको तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियोंके पास जाकर समझ, उनको भलीभांति दण्डवत् प्रणाम करनेसे, उनकी सेवा करनेसे और कपट छोडकर सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे वे परमात्म तत्त्वको भलीभांति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञानका उपदेश करेंगे | भावार्थ : ज्ञानको पानेके […]
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ – श्रीमदभगवद्गीता (२.३८) अर्थ : जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुखको समान समझकर, उसके पश्चात युद्धके लिए तैयार हो जा, इस प्रकार यद्ध करनेसे तू पापको नहीं प्राप्त होगा | भावार्थ : युद्धके समय यदि कोई किसीकी मृत्युका कारण बनेगा तो कर्मफल न्यायके सिद्धान्त अनुसार, […]
कर्मण्य कर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ अर्थ : जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है॥- श्रीमदभगवाद गीता (4:18) भावार्थ : जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता […]
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ – श्रीमद्भगवद गीता (४: १४) भावार्थ : कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते- इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता॥ -तनुजा ठाकुर