अध्यात्म एवं साधना

शब्दातीत अध्यात्मकी अनुभूति हो जानेपर शब्दोंका नहीं रह जाता कोई महत्व


शब्दातीत अध्यात्मकी अनुभूति हो जानेपर शब्दोंका कोई महत्व नहीं रह जाता;  परंतु यह भी एक कटु सत्य है कि आध्यात्मिक यात्राकी शुभारम्भ शब्दजन्य जानकारीसे ही होती है | – तनुजा ठाकुर  

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क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – १६)


यदि हमें हमारे प्रारब्धकी तीव्रताको सहजतासे सहन करना हो या अपने संचित कर्मोंको नष्ट करना हो तो दोनों ही स्थितियोंमें नामजप एक सरल माध्यम है । नामजपसे प्रारब्धकी तीव्रताका प्रभाव ऐसे न्यून होता है जैसे कोई कोयलेकी अग्निपर चल रहा हो और तेज (अग्नि) तत्वकी सिद्धि होनेके कारण उसे अग्निकी उष्णताका प्रभाव नहीं पड रहा […]

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दुख हमें अन्तर्मुख करता है !


दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय। जो सुख में सुमिरन करे तो दुःख काहे को होय॥ अर्थ : दुखमें ईश्वरका स्मरण सहज हो जाता है; परन्तु सुख रहनेपर ईश्वरका स्मरण किंचित ही आता है; अतः कुंतीने भगवान श्रीकृष्णसे कहा था कि मुझे दुख चाहिए, जिससे आपका स्मरण रहे । सुख हमें […]

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साधना अल्प आयुमें क्यों आरम्भ करनी चाहिए ?


चित्तपर अनेक जन्मोंके असंख्य संस्कारके कारण ही मन अशान्त रहता है | जैसे-जैसे आयु बढती है, पूर्वके संस्कारोंके केन्द्र और पुष्ट हो जाते हैं एवं नए संस्कार निर्माण होते हैं; इसलिए यदि एक पांचवीं कक्षाका विद्यार्थी, जब नामजप करने बैठेगा तो उसके मनमें, अपने माता-पिता, भाई-बहन, क्रीडा(खेल), मित्र और विद्यालयके ही विचार आएंगे; परंतु एक […]

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प्रार्थनाके चरण


प्रार्थना, आरंभिक अवस्थामें शब्दजन्य होता है और साधनाके प्रगत अवस्थामें वह शब्दातीत हो जाता है अर्थात् मात्र शरणागत भाव प्रार्थनाके समय रह जाता है ! – तनुजा ठाकुर

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विषयासक्ति विहीन जीवनमुक्त जीवात्मायें सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें करते हैं भ्रमण !


विषयासक्ति विहीन जीवनमुक्त जीवात्मायें स्वच्छंद पंछी समान सम्पूर्ण ब्रह्मांडमें स्थूल और सूक्ष्म स्तरपर विचरण करते हैं;  परंतु उनके अभिज्ञान (पहचान) एवं दर्शन हेतु साधनाका ठोस आधार चाहिए ! -तनुजा ठाकुर

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हम किसी भी मार्गसे साधना करें, होता वह हठयोग ही है !


चाहे हम किसी भी योगमार्गसे साधना करें वह अंततः हठयोग ही होता है, जीवात्माको मायासे खींच कर ब्रह्मतक ले जाना, अर्थात् इस मायावी सृष्टिके गुरुत्त्वाकर्षणके विरुद्ध जाते हुए उस पुरुष तत्त्वकी ओर मार्गक्रमण करना; और प्रकृतिके विरुद्ध जाना हठयोग ही तो है | मात्र जब जीवको उस सत-चित-आनंदकी प्रचीति होने लग जाती है, तब प्रकृतिका […]

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सम्पूर्ण सृष्टि एक विशाल कर्मक्षेत्र है !


सम्पूर्ण सृष्टि एक विशाल कर्मक्षेत्र है | चींटीसे लेकर मनष्यतक सभी इस कर्मभूमिमें प्रकृति प्रदत्त गुण अनुरूप क्रियाशील रहते हैं ! अर्थात् इस सृष्टिमें अकर्मण्य कोई नहीं |   – तनुजा ठाकुर

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किसीको साधना पथसे च्युतकर, उसे पुनः मायामें ले जाना भी पाप है, यह ध्यान रहे !


देहलीके एक व्यक्ति ‘उपासना’के सेवाकेन्द्रमें आए थे, वे सेवाकेन्द्रमें सेवारत एक युवा साधकको कहने लगे कि मैं आपकी चाकरी (नौकरी) लगवा देता हूं, आप वह करें ! उन साधकने निर्णय लिया है कि वे कुछ समय पूर्ण समय साधना करेंगे; परन्तु वे आगंतुक उन्हें बार-बार बोल रहे थे कि आप चाकरी करें और साथमें साधना […]

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अध्यात्मविदके चैतन्यसे जिज्ञासु और साधक स्वतः ही हो जाते हैं आकृष्ट !


जैसे पुष्पके सुगन्धसे भौंरे स्वतः ही आकृष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार अध्यात्मविदके चैतन्यसे उनके आध्यात्मिक स्तर अनुरूप, सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके जिज्ञासु और साधक स्वतः ही आकृष्ट हो जाते हैं ! – तनुजा ठाकुर

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