क्रोधो वैवस्वतो राजा तॄष्णा वैतरणी नदी । विद्या कामदुघा धेनु: सन्तोषो नन्दनं वनम्॥ अर्थ : क्रोध यमराजके समान है और तृष्णा नरककी वैतरणी नदीके समान। विद्या सभी इच्छाओंको पूरी करनेवाली कामधेनु है और संतोष स्वर्गका नंदन वन है॥
पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनं। कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद् धनं ॥ अर्थ : पुस्तकमें लिखी हुई विद्या, दूसरेके हाथमें गया हुआ धन, आवश्यकता पडनेपर उपयोगमें नहीं आते हैं।
रोहते सायकैर्विद्धं वनं परशुना हतम् वाचा । दुरुक्तं भीभत्सं न सम्रोहति वाक्क्षतम् ।। – महाभारत, उद्योगपर्व अर्थ : धनुषद्वारा किये गए आघातके घाव भर सकते हैं, कुल्हाडीसे काटा गया वन पुनः पल्लवित हो सकता है; परंतु शब्द-बाणद्वारा किया गया कटाक्षको भूलना संभवतः कठिन है।
यथोद्धरति निर्दाता कक्षं धान्यं च रक्षति । तथा रक्षेन्नृपोराष्ट्रं हन्याच्च परिपन्थिनः ।। – मनुस्मृति(७.११०) अर्थ : जिस प्रकार खेती करनेवाला किसान धान्यकी रक्षा हेतु खर-पतवारको उखाड फेंकता है, उसी प्रकार राजाको राष्ट्रकी रक्षा हेतु विरोधियोंका समूल नाश कर देना चाहिए । इस देशके शासनको राजधर्मके इस सिद्धांतका पालनकर शत्रु राष्ट्र पाकिस्तानके समूल नाशके विषयमें अब […]
अष्टौ गुणा पुरुषं दीपयंति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च। पराक्रमश्चबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥ अर्थ : आठ गुण पुरुषको सुशोभित करते हैं – बुद्धि, उत्तम चरित्र, आत्म-नियंत्रण, शास्त्र-अध्ययन, साहस, मितभाषिता, यथाशक्ति दान और कृतज्ञता।
मूर्खस्य पञ्च चिन्हानि गर्वो दुर्वचनं तथा । क्रोधश्च दृढवादश्च परवाक्येष्वनादरः ॥ अर्थ : मूर्खोंके पांच लक्षण हैं – गर्व, अपशब्द, क्रोध, हठ और दूसरोंकी बातोंका अनादर
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियं । प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः ॥ अर्थ : सत्य बोलें, प्रिय बोलें; परन्तु अप्रिय सत्य न बोलें और प्रिय असत्य न बोलें, ऐसी सनातन रीति है।
उदये सविता रक्तो रक्त:श्चास्तमये तथा । सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ॥ अर्थ : उदय होते समय सूर्य लाल होता है और अस्त होते समय भी लाल होता है, सत्य है महापुरुष सुख और दुःखमें समान रहते हैं।
नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। विक्रमार्जितसत्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता ॥ अर्थ : कोई भी सिंहको, वनके राजाके रूपमें अभिषेक या संस्कार नहीं करता है, अपने पराक्रमके बलपर वह स्वयं पशुओंका राजा बन जाता है ।
प्रदोषे दीपकश्चंद्र: प्रभाते दीपको रवि:। त्रैलोक्ये दीपको धर्म: सुपुत्र: कुलदीपक:॥ अर्थ : सन्ध्याको चन्द्रमा प्रकाशित करता है, दिनको सूर्य प्रकाशित करता है, तीनों लोकोंको धर्म प्रकाशित करता है और सुपुत्र पूरे कुलको प्रकाशित करता है ।