अध्यात्ममें व्यक्तिकी आयु नहीं देखी जाती, उसकी वृत्ति एवं कृति देखी जाती है; इसीलिए अपनेसे छोटे आयुके सन्तोंके भी सब चरणस्पर्श करते हैं । इसके विपरीत आधुनिक विचारधारायुक्त न्यायप्रणाली केवल आयु देखती है; इसीलिए अपराध करनेकी बुद्धि रखनेवालोंको भी बालक ही समझती है !
कुछ समय पूर्व प्रसिद्ध हुए एक वृत्त अनुसार उत्तरप्रदेशमें ५००० भृत्य (चपरासी) नियुक्ति हेतु २३ लक्ष आवेदन आए । आवेदन करनेवालोंमें कुछ आवेदनकर्ता विद्यावाचस्पती (डॉक्टरेट) थे । लोकतन्त्रसे प्राप्त इस वस्तुस्थितिपर मात करने हेतु एकमेव उपाय है, हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करना ! (२३.१२.२०१५) – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक सनातन संस्था
कई साधकोंकी सेवाएं बैठकर करनेवाली होती हैं, जिससे उनके शरीरका व्यायाम नहीं होता । इस कारण आरोग्य बिगडकर त्वचाके नीचे गांठ बनना जैसे अनेक विकार होते हैं, सेवा करनेकी क्षमता भी न्यून होती है । इससे बचनेके लिए प्रतिदिन १५-२० मिनिट शरीरके प्रत्येक स्नायुका व्यायाम हो, अतः सूर्यनमस्कार एवं अन्य व्यायाम करें ! इस कारण […]
कहां अपूर्ण विज्ञान और कहां परिपूर्ण अध्यात्म ? विज्ञान अपूर्ण है, इसीलिए उसमें सतत् संशोधन करना पडता है । वह संशोधन भी मायाके सन्दर्भमें होनेके कारण तात्कालिक सुखदायी होता है । इसके विपरीत अध्यात्ममें संशोधन नहीं करना पडता; क्योंकि वह चिरन्तन आनन्द देनेवाला परिपूर्ण शास्त्र है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन […]
गुरुकृपायोगमें स्वभावदोष तथा अहं निर्मूलनको प्रधानता दी जाती है । कारण, सत्ययुगमें स्वभावदोष तथा अहं नहीं थे । त्रेता तथा द्वापर युगोंमें स्वभावदोष तथा अहंमें वृद्धि होती गई, तब भी वे एक मर्यादामें थे । कलियुगमें इनमें अतिशय वृद्धि होनेसे इन्हें न्यून करना आवश्यक है; इसलिए गुरुकृपायोगमें इन्हें न्यून करनेको प्रधानता दी जाती है । […]
प्रतिदिन लक्षावधि लोग ईश्वरको प्रार्थना करते हैं, उनमेंसे कुछ ही जनोंकी प्रार्थनाको ईश्वर प्रतिसाद देते हैं, कारण वे यथार्थमें साधक होते हैं; अतः साधना करके खरे साधक बनो ।
व्यक्तिस्वातन्त्र्यके नामपर राजनीतिज्ञोंके विषयमें कोई अनर्गल वार्तालाप नहीं कर सकता; परन्तु देवताओंके सम्बन्धमें अनर्गल बोलते हैं ! हमें इसे परिवर्तित करना है ।
भारतपर सतत घात करनेके उदेश्यसे चीन देश, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका इत्यादि देशोंसे मित्रता स्थापित करता है तो उस उदेश्यको असफल करने हेतु भारत किसी एक भी देशसे मित्रता क्यों नहीं कर सकता ? – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक सनातन संस्था
वसिष्ठ ऋषि, विश्वामित्र ऋषि, भृगु ऋषि, अत्रि ऋषि, अगस्ति ऋषि, नारद मुनि आदिकी शिक्षाएं और नाम युगों-युगोंसे चले आ रहे हैं । इसके विपरीत, बुद्धिजीवियों और धर्मद्रोहियोंके नाम १-२ पीढियोंके पश्चात लोग भूल जाते हैं । ऋषि-मुनि सत्यवादी थे, इसलिए काल उनके नाम और उनकी ज्ञानको छू नहीं सका । इसके विपरीत, बुद्धिमानों, धर्मद्रोहियों तथा […]
भाव, श्रद्धा और भक्तिमें अन्तर १. १. भाव : देवताके अस्तित्वका अनुभव २. श्रद्धा : दृढ विश्वास कि भगवान सदैव अच्छा करते हैं । ३. भक्ति : जो विभक्त नहीं होता वह भक्त है, अर्थात जो भगवानसे एकरूप हुआ है । साधनाके प्रथम चरणमें भाव होता है । उसका अगला चरण है, श्रद्धा और अन्तिम […]