सन्तोंद्वारा एक ही प्रश्नका भिन्न-भिन्न व्यक्तियोंको भिन्न-भिन्न उत्तर अथवा एक ही व्यक्तिको भिन्न-भिन्न समयपर भिन्न-भिन्न उत्तर देनेके कारण – कभी-कभी सन्त एक ही प्रश्नका उत्तर एकको कुछ देते हैं तो, दूसरेको कुछ और देते हैं । कभी एक ही व्यक्तिको भिन्न-भिन्न समयपर एक ही प्रश्नका भिन्न-भिन्न उत्तर देते हैं । ऐसा क्यों ? यह प्रश्न […]
राजनीतिज्ञोंको दिशा देना है सन्तोंका कर्तव्य कहां राजनेता अपने यहां आते हैं, इसपर अभिमानकर उन्हें योग्य दिशा न देनेवाले आजके सन्त, तो कहां छत्रपति शिवाजी महाराजको मार्गदर्शन करनेवाले समर्थ रामदासस्वामी ! – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
विविध सन्त एवं सम्प्रदायके धार्मिक मासिकमें अनेक बार सिक्थ-वर्तिकासे (मोमबत्तीसे) दीप प्रज्ज्वलन कर रहे हैं, इस प्रकारका छायाचित्र प्रसिद्ध होते हुए हमें दिखाई देता है । दीप प्रज्ज्वलन तमोगुणी सिक्थ-वर्तिकासे नहीं; अपितु सात्त्विक तेलके दियेसे (सकर्ण दीप) करना चाहिए, यह धर्मशास्त्र कहता है । सन्तोंको धर्मशिक्षण नहीं होनेके कारण और भारतीयोंपर अंग्रेजोंकी ईसाई संस्कृतिकी पकड […]
जगभरके विदेशी लोगोंको भारतके विषयमेंजो प्रेम है, वह भारतमें सन्तोंद्वारा सिखाई जानेवाली साधना और अध्यात्मके कारण, राजनीतिज्ञों और राजनीतिक पक्षोंके कारण नहीं ।
गणित तथा भूगोल ये भिन्न-भिन्न विषय है । एक विषयकी भाषामें दूसरे विषयको बताना सम्भव नहीं । उसीप्रकार विज्ञान तथा अध्यात्म, ये भिन्न-भिन्न विषय हैं, विज्ञानको यह ज्ञात होना आवश्यक है । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले
‘भगवानके घर देर है; किन्तु अंधेर नहीं’, ऐसी कहावत है । हमारे उतावलेपनके कारण भगवन देरीसे सहायता करते हैं, ऐसा प्रतीत होता है ।
कहां इंग्लैण्डसे आए मुट्ठीभर अंग्रेज सम्पूर्ण भारतपर कुछ ही वर्षोंमें शासन करने लगे और कहां स्वतन्त्रताके उपरान्त ७० वर्षोंके कालान्तरमें विभाजित भारतपर भी शासन करनेमें असक्षम, प्रतिदिन हिंसाके समाचारोंसे युक्त अभीतकके शासनकर्ताओंका राज्य । इसपर मात्र एक ही उपाय है और वह है हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले, संस्थापक, सनातन […]
इच्छापूर्तिमें सर्वाधिक सुख वासनापूर्तिसे प्राप्त होता है । जब साधनामें प्रगति होकर आनन्दकी अनुभूति होने लगती है, तब वासनापूर्तिका सुख कितना निम्न स्तरका है, यह ज्ञात होता है तथा उसके प्रति नकारात्मकता आती है, कारण उस समय आनन्दकी अनुभूति लेना सम्भव नहीं होता ।
‘ये शब्द साधनाके सन्दर्भमें हैं, यह ध्यानमें न रखते हुए एक साधकने साधनामें पत्नीके विरोधको ‘परेच्छा’ समझ साधना करना बन्द कर दिया । एक जिज्ञासुने प्रश्न किया, “मित्र मदिरापानका आग्रह करे तो मदिरापान करना उचित है क्या ?” यहां ध्यानमें रखने योग्य बात यह है कि ऐसे प्रसंगोंमें परेच्छाके स्थानपर ‘ईश्वरेच्छा’ क्या होगी ? इसका विचार […]
बुद्धिप्रामाण्यवादियोंको विज्ञानका भले ही अहंकार हो, उन्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि उन्हें सूक्ष्मसे सूक्ष्म एक कोशिकीय प्राणी तो जाने दें, अपितु बाह्य वस्तुओंके उपयोगके बिना पाषाणका एक कण भी बनाना असम्भव है । इसके विपरीत ईश्वरने अनेक कोशिकायुक्त मानव तथा अनन्त कोटि ब्रम्हाण्डोंका निर्माण किया है । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले, संस्थापक, […]