श्रीगुरु उवाच

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हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाहेतु ब्राह्मतेजसे सम्पन्न आध्यात्मिक संस्थाएं तथा क्षात्रतेजसे सम्पन्न राष्ट्र एवं धर्मका कार्य करनेवाले हिन्दू संगठन आवश्यक हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले संस्थापक, सनातन संस्था

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अभिभावको, अपने बच्चोंको अभीसे सात्त्विक भारतीय भाषाओंमें शिक्षा दो !


हिन्दू राष्ट्रमें जिनकी शिक्षा सात्त्विक भारतीय भाषाओंमें हुई है, ऐसोंको ही चाकरी (नौकरी) दी जाएगी । अंग्रेजी माध्यममें शिक्षा लेनेवालोंको चाकरी नहीं मिलेगी । अभिभावक इसका विचारकर अभीसे ही अपने बच्चोंको सात्त्विक भारतीय भाषाओंमें शिक्षा दें ! हिन्दू राष्ट्रमें तामसिक अंग्रेजी भाषाकी शिक्षाका कोई स्थान नहीं होगा, सात्त्विक भारतीय भाषाओंमें ही शिक्षा लेना अनिवार्य होगा […]

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श्रीगुरु उवाच


एक दिन भी ऐसा है कि जिस दिन हिन्दुओंके लिए कोई अच्छा समाचार आया हो ?

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बालकोंको साधना हेतु आश्रममें रहनेका विरोधकर उन्हें मायामें अटकानेका घोर पाप करनेवाले बहुसंख्य पालक !


१. शंकराचार्यने ८ वर्षकी आयुमें तथा समर्थ रामदासस्वामीने १२ वर्षकी आयुमें साधना करने हेतु घर त्याग दिया, तब ‘वे कहां जाएंगे ? कहां रहेंगे ? उनका ध्यान कौन रखेगा ?’, इसकी चिन्ता उनके पालकोंने नहीं की, इसके विपरीत सनातान संस्थाके आश्रममें आधुनिक वैद्योंसह सर्व सुविधाओंके होते हुए भी कुछ एक आदर्श पालकोंको छोड बहुसंख्य पालक […]

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श्रीगुरू उवाच


अन्य धर्मियोंको गोमांस भक्षणका अधिकार है तो हिन्दुओंको गोरक्षणका अधिकार क्यों नहीं ?

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हिन्दुओ ! कालमहात्म्य समझ कृति करो !


‘कालमहात्म्यानुसार कोई बात अभी मत करो, आगे करो’, ऐसा कहा तो, कुछ हिन्दुत्ववादियोंको उसका महत्त्व समझमें नहीं आता । उन्हें लगता है, ‘मेरे सामने हिन्दुओंपर तथा गायोंपर अत्याचार हों, तो मैं शान्त कैसे बैठूं ? भले ही प्राण जाएं; परन्तु मैं कृति करूंगा !’ वे आगेके सूत्रोंपर ध्यान दें तो, उन्हें कालमहात्म्य समझमें आएगा – […]

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साधनाके सन्दर्भमें तन-मन-धनके त्यागमें धनका त्याग सबमें कनिष्ठ !   


धनका त्याग करना बहुतोंको कठिन लगता है, कारण भविष्यकालमें धन ही उपयोगमें आएगा, ऐसा वे सोचते हैं । साधनाके सन्दर्भमें तन-मन-धनके त्यागमेंसे धनका त्याग सबसे कनिष्ठ होता है; क्योंकि उससे स्वभावदोष निर्मूलन नहीं होता अर्थात मनका त्याग नहीं होता । इसके विपरीत धनका त्याग करनेसे अहं बढता है, इससे तनका त्याग करना अर्थात सेवा करना भी […]

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श्रीगुरू उवाच


सभी एक ही प्रार्थना करें ! यह अयोग्य है !विविध पंथोंमें तथा सम्प्रदायोंमें सभीके द्वारा की जानेवाली प्रार्थनाएं एक समान होती हैं । यह किस प्रकार अयोग्य है ?, इसे व्यावहारिक उदाहरणसे समझ लेते हैं । संतोंके पास जानेवाले अनेक लोग उन्हें अपनी व्यावहारिक इच्छाओंके सन्दर्भमें पूछते हैं तथा उसी सन्दर्भमें प्रार्थना करते हैं, जो […]

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श्रीगुरू उवाच


जिसकी उत्पत्ति है, उसकी स्थिति है तथा उसका लय भी होता है । हिन्दू धर्मकी उत्पत्ति कभी नहीं हुई; अतः वह अनादि है, चिरन्तन है । इसके विपरीत अन्य सभी धर्मोंकी (प्रत्यक्षमें वे पन्थ हैं) उत्पत्ति हुई है; अतः उनका लय, नाश निश्चित है । वह काल अब निकट आ रहा है ।

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साधनाके दो मार्ग


साधना कर, सूक्ष्मातिसूक्ष्म होकर या सर्वव्यापी होकर, ईश्वर समान उनके सूक्ष्मातिसूक्ष्म या सर्वव्यापी रूपसे एकरूप होते हैं । ध्यानयोगसे सूक्ष्मातिसूक्ष्म होकर ईश्वरसे एकरूप होते हैं, जबकि समष्टि साधनासे ईश्वरके सर्वव्यापी रूपसे एकरूप होते हैं । ध्यानयोगकी अपेक्षा, गुरुकृपायोग अनुसार समष्टि साधना अधिक सहज और सुलभ है; अतः इसकेद्वारा आध्यात्मिक उन्नति शीघ्र होती है । – […]

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