१ अ. स्वेच्छाका वर्तन : कोई स्वैराचारी अर्थात् स्वेच्छासे वर्तन करनेवाला घरपर कैसा व्यवहार करता है, इसका समाजसे कोई सम्बन्ध नहीं होता; किन्तु जब वह समाजमें स्वेच्छाका वर्तन करने लगता है, तब उसके विकृत व्यवहारका समाजपर दुष्परिणाम होता है । समाजको स्वस्थ बनाए रखना, यह सभीका कर्तव्य है । समाज अच्छा हो तो ही राष्ट्रका रक्षण कर […]
१. द्वापरयुगके महाभारतकी आदर्श शिक्षा दुर्योधन, कौरव कुलके विनाशका कारण बनेगा, ऋषिमुनियोंको यह ज्ञात था; अतः उसके जन्मके पूर्वही उसका त्याग किया जाए, ऐसा धृतराष्ट्रको बताते हुए ऋषि-मुनि कहते हैं, त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ – महाभारत, पर्व १, अध्याय १०७, श्लोक ३२ अर्थ : सम्पूर्ण कुलके कल्याण […]
१. अबतक पाकिस्तान बांग्लादेश एवं कश्मीर स्थित हिन्दुओंपर होनेवाले अत्याचारोंके समाचार हमने पढे । अब बंगालवासी हिन्दुओंपर अत्याचारके समाचार आने लगे हैं । भविष्यमें भारतमें सर्वत्र हिन्दुओंपर अत्याचारके समाचार आएंगे । सभी राजकीयपक्ष आजतक इन घटनाओंको टालनेमें असमर्थ रहे हैं और आगे भी इन्हें टालनेमें असमर्थ रहेंगे । इससे बचने हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करना […]
१. जो अन्धी, बहरी या भ्रष्ट पुलिस रातके दो-तीन बजेतक सार्वजनिक रूपसे फोडे जानेवाले पटाखोंको नहीं रोक सकती, ,वह कभीगुप्त रूपसे किए जानेवाले आतंकवादियोंके बमविस्फोट रोकसकती है क्या ? पटाखोंका प्रदूषण रोकनेके लिए अब हिन्दू राष्ट्र ही आवश्यक है । २. गोरक्षण करनेवालों ! तुम्हारी गोशालापर कोई आक्रमण हो तो गोरक्षण करनेका सामर्थ्य तुममें है […]
‘पुत्री संसारमें रहकर साधना करे’, ऐसी स्वेच्छाके होते पुत्रीको ‘विवाह ही ईश्वरेच्छा हो सकती है’, ऐसा दृष्टिकोण देनेवाले एक साधक कुटुम्बीय । एक पूर्णकालीन सेवा करनेवाली साधिकाको विवाह कर मायाके बन्धनमें बन्धनेकी इच्छा नहीं थी, तब उसके साधक माता-पिताने उसे निम्न दृष्टिकोण दिया – पूर्ण समय साधना करना, यह तुम्हारी स्वेच्छा हुई । तुम्हारे प्रारब्धमें […]
व्यष्टि साधना करनेवालेका आध्यात्मिक स्तर ८०% होनेतक उसका ध्यान स्वयंकी प्रगतिपर ही केन्द्रित रहता है । इसके आगे जानेपर उनकेद्वारा ज्ञानमें न होते हुए समष्टिका कार्य उनके अस्तित्वसे होने लगता है, जैसे ईश्वरके केवल अस्तित्वसे अनन्तकोटि ब्रह्माण्डका कार्य चलता रहता है, उसीप्रकार कार्य होता है । २. समष्टि साधना कुछ व्यक्तियोंको लगता है कि व्यष्टि […]
साधकोंकी क्षमताका ध्यान रखते हुए उन्हें सेवा एवं व्यष्टि साधनाके प्रयत्नके विषयमें बताएं ! प्रत्येक साधककी क्षमता भिन्न होती है । उस क्षमताका अभ्यास करनेके पश्चात् ही उत्तरदायी साधकोंको सेवा तथा व्यष्टि साधनाके प्रयत्न विषयक साधक बताएं । साधककी क्षमताका ध्यान न रखते हुए अल्पक्षमताके साधकोंको उनकी क्षमतासे अधिक सूत्र बतानेसे वे तनावग्रस्त होकर नकारात्मक […]
‘देवघर’ हिन्दुओंके घरका एक अविभाज्य अंग है । आजकी सदनिका (फ्लैट) संस्कृतिसे देवघर अदृश्य हो चुका है; इसलिए सदनिकामें देवघरका होना, आधुनिक हिन्दुओंको अडचन प्रतीत होने लगा है । दक्षिण भारतके हिन्दुओंने वैज्ञानिक प्रगति करते हुए भी धर्माचरणका त्याग नहीं किया । दक्षिण भारतमें कितना भी छोटा घर अथवा सदनिका हो, उसमें देवघरको स्थान अवश्य […]
अब एक-एक रोगीके लिए नहीं अपितु मरणोन्मुख स्थितिवाले राष्ट्र तथा धर्म हेतु सहस्रों राष्ट्रप्रेमी तथा धर्मप्रेमी रुपी चिकित्सकोंकी आवश्यकता हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले
१. अधिकांश जन वृद्धावस्थाके कालमें शारीरिक विकार तथा मानसिक अस्वस्थतासे ग्रसित होकर जीवनसे उकता जाते हैं और वे मृत्युकी बाट जोहते हैं । २. साधनामें प्रगति करनेपर कुछ जनोंको मृत्यु उपरान्तका नूतन जगत देखें, ऐसी इच्छा होती है; जिज्ञासा होती है कि वह जगत कैसा होगा; इसलिए भी वे मृत्युकी बाट जोहते हैं । – […]