श्रीगुरु उवाच

श्री गुरु उवाच


हमारे श्रीगुरुके मार्गदर्शनमें अभी तक 40 साधक संत पदपर विराजमान हो चुके हैं जो कि विश्वके इतिहासमें एक अद्वितीय घटना है |यह सत्य है कि सर्वोच्च स्तरके अर्थात परात्पर पदके संत अनेक साधक जीवका उद्धार करनेमें सक्षम है, इतिहास साक्षी है कि अनेक परात्पर पदपर आसीन संतोंने अनेक संत-शिष्य संसारको दिये भी परंतु हमारे श्रीगुरुने […]

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कोई बालक ‘माता-पिता कौन ?’ इसकी खोज करनेका प्रयत्न करे, तथा उत्तर न मिलनेपर, ‘माता-पिता होते ही नहीं’, यह कथन जितना हास्यास्पद है, उतना ही बुद्धिप्रामाण्यवादियोंका ‘ईश्वर नहीं हैं’, यह कहना हास्यास्पद है । -परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले

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हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना केवल संतोंके संकल्प एवं अस्तित्वके कारण होनेवाली है ! हम हिन्दुराष्ट्रकी स्थापना हेतु कार्यरत हिन्दुत्त्ववादी कार्यकर्ता और नेता इनका कार्य तथा संतोंद्वारा किया जानेवाला कार्य इनमें आकाश-पातालका अंतर निम्नप्रकार है । ध्यान रहेकी संतोंमें भी भिन्न प्रकार हैं, यहां उल्लेखित संत उच्च कोटिके हैं । १. कार्यकर्ता : ये मन एवं स्थूल देहके […]

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साधकका एवं सर्वसाधारण व्यक्तिके विवाहका उससे संबंध साधकका विवाह संसारमें कमसे कम ३० प्रतिशत और साधनामें कमसे कम ३० प्रतिशत पूरक होनेसे सांसारिक जीवन सुखमय हो, साधनामें प्रगति होती है । सर्वसाधारण व्यक्तिमें यह प्रमाण अनुक्रममें १० प्रतिशत और २ प्रतिशत होत है । -परात्पर गुरु डॉ  जयंत आठवले (११.११.२०११) भावार्थ : विवाह प्रारब्ध अनुसार […]

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राजनीतिज्ञोंका अहंकार ! हिन्दू जनजागृति समिति एवं सनातन संस्थाद्वारा आयोजित विशाल धर्मसभा हेतु पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरी पीठाधीश्वर श्रीमत् जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज मुंबई, गोवा और पुणे आए थे ।उनके आनेकी सूचना कई राजनेताओंको दी गई थी । उनमेंसे अत्यल्प व्यक्ति उनके दर्शन हेतु आए । अधिकतरको अहंकार था कि शंकराचार्य स्वामीजीको उनसे मिलने […]

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साधनासे शाश्वत आनंदकी प्राप्ति संभव ! पति-पत्नी एक दूसरेसे शारीरिक दृष्टिसे एकरूप होकर अल्पकालके लिये सुखकी अनुभूति लेते हैं किन्तु भक्त भगवानसे सदासर्वदा एकरूप होकर नित्य आनंद अनुभव करते हैं | – परात्परगुरु डॉ. जयंत आठवले (१२.७.२०१२)

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अध्यात्ममें कोई कभी भी गिर सकता है !


सामान्यतया शिक्षण पूर्ण करनेपर जो उपाधि मिलती है वह सदैव ही हमारे पास रहती है | मात्र कभी कोई अधिवक्ता( वकील) या चिकत्सक (डॉक्टर )कोई अक्षम्य अपराध करे तो ही उसकी उपाधि (पदवी )ले ली जाती है | परंतु अध्यात्ममें आध्यात्मिक स्तर साठ प्रतिशत हो या सत्तर प्रतिशत या उसके भी आगे तथापि वहांसे कोई […]

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श्रीगुरु उवाच


शब्द योग्य प्रकारसे न लिखनेपर होनेवाला भाषाका विनोद एक लेखका शीर्षक था,`Saints and Sad Gurus'(संत तथा दुःखी गुरु ) शीर्षकसे अर्थबोध नहीं हुआ; तो पढकर देखा, तब समझमें आया कि वह शीर्षककी चूक थी, `Saints And Sadgurus’ (संत तथा सद्गुरु) यह होना चाहिए था । इस घटनासे ज्ञात हुआ कि कोई भी लेख प्रकाशित करनेसे […]

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मनोनीत (मनसे निर्धारित) नामजप तथा गुरुद्वारा दिया गया नाम


मनोनीत नामजप करनेसे उसमें न्यून-अधिक मात्रामें अहंभाव होता ही है; परंतु गुरुद्वारा दिया गया नाम जपनेमें अहंभाव नहीं होता । साथ ही उस नाममें चैतन्य होता हैः अतः प्रगति शीघ्र होती है । – परम पूज्य भक्तराज महाराज (संदर्भ : सनातनका मराठी प्रकाशन ‘संत भक्तराज महाराज यांची शिकवण’)

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अध्यात्म विचार :


मोमबत्तीका प्रकाश अर्थात भक्ति और अधिक तेज प्रकाश अर्थात योग योगीका तेज असहनीय होता है और भक्तिका अल्प सा प्रकाश मूल्य समझमें नहीं आता । योगीका तेज दिखाई देता है परंतु भक्तिका सामर्थ्य छिपा होता है। – संत भक्तराज महाराज भावार्थ : यहां योगीका भावार्थ शक्तिके स्तरके संतोंसे है जिसका आध्यात्मिक स्तर 70% तक होता […]

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