साम्प्रदायिक साधनामें बहुदा भक्तों की प्रगति न होने से उनका साधना सम्बन्धित विश्वास डगमगाता है । ऐसा न हो, इसलिए ‘जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृति, उतने साधना मार्ग’ यह सिद्धान्त ध्यानमें रखकर सम्प्रदायके प्रमुखोंने उसप्रकार मार्गदर्शन करना चाहिए । इस हेतु उन्हें विविध साधनामार्गोंका अभ्यास करना आवश्यक है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, […]
राजकीय पक्षके नेता तथा कार्यकर्ताको यदि कोई धन तथा पदका लोभ दे तो वे दूसरे पक्षमें जाते हैं | इसके विपरीत भक्त ईश्वरका पक्ष त्यागकर, ईश्वर चरणोंका स्थान त्यागकर अन्यत्र कहीं नहीं जाता | – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात (http://sanatanprabhat.org)
चुनाव विषयक प्रतिदिन आनेवाले समाचार पढकर लगता है, अब चुनाव बालक्रीडा हो गए हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : https://sanatanprabhat.org/
साधक चुनावमें जीतें तो उनमें स्वार्थ न होनेसे वे राजनेताओं समान भ्रष्टाचार कभी नहीं करेंगे । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : https://sanatanprabhat.org/
विचारस्वातंत्र्य अर्थात दूसरेको व्यथित कर अथवा धर्मविरुद्ध बोलनेका स्वातंत्र्य नहीं है, इतना भी स्वतंत्रता पश्चात ७१ वर्ष भारतपर शासन करनेवाले एक भी राजकीय पक्षके ध्यानमें नहीं आया । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : https://sanatanprabhat.org/
वैद्यकीय पदवीधारक न होनेनेपर रोगियोंपर उपचारकी अनुमति नहीं दी जाती । उसीप्रकार राष्ट्र तथा धर्म विषयी जिनमें प्रेम नहीं तथा उस सम्बन्धमें जो कुछ करते नहीं, ऐसे शासनकर्ता चुनकर देनेका अधिकार जनताको देनेसे क्या होता है ? यह भारतकी आजकी दुःस्थितिसे ज्ञात होता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : https://sanatanprabhat.org/
राजकीय पक्षके कार्यकर्ताओंको स्वार्थ हेतु उनके पक्षकी सरकार आवश्यक होती है तो साधकको, सबका कल्याण हो, इस हेतुसे ईश्वरी (धर्म) राज्य हो, ऐसा चाहिए होता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : https://sanatanprabhat.org/
तत्त्वशून्य राजकीय पक्ष जनताको प्रसन्नकर, चुनकर आनेके लिए कुछ भी करते हैं वहीं साधक मात्र ईश्वरको प्रसन्न करनेके लिए कठोर प्रयत्न करनेको सिद्ध रहते हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : https://sanatanprabhat.org/
राष्ट्र तथा धर्म हेतु कुछ करें , यह सोचकर कोई चुनावमें नहीं उतरता अपितु स्वयंके मानमें वृद्धि तथा धनप्राप्तिके लिए, अधिकतर जन चुनावमें खडे होते हैं | – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
आज अनेक जन, धन लेकर कार्य करते हैं, ऐसा अनेक मतदाताओंके साथ होता है । वे धन देनेवालेको मत देते हैं । मतदाताओंको लोभवश धन देनेवाले चुनकर आते है और राज्य करते हैं । इससे तथाकथित लोकतन्त्रकी दशा दयनीय हुई है । इसपर उपाय एक और वह है हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना कर, उसे सर्वस्वका त्याग […]