श्रीगुरु उवाच

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‘समानशीले व्यसनेषु सख्यम् ।’ अर्थात समान स्वभावके अथवा संकटमें फंसे लोगोंकी मैत्री स्वतः ही हो जाती है, ऐसा सिद्धान्त है । इस सिद्धान्तके अनुसार, बुद्धिप्रामाण्यवादी एवं उनके समान अनिष्ट शक्तियोंसे आवेशित लोग श्मशानमें पार्टी (भोज) अथवा विवाह भी करते हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : मराठी दैनिक सनातन […]

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भारतके सभी राजनीतिक दलोंके शासकोंकी भ्रष्टाचारसे इकट्ठा की गई संपत्ति सरकारी कोष में डाली जाए, तो भारतको विश्‍वसे भीख नहीं मांगनी पडेगी । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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हिन्दू राष्ट्रकी जनता १५ अगस्त, २६ जनवरी इन राष्ट्रीय दिवसोंका उपयोग, अवकाशके फलस्वरूप दूरदर्शनके कार्यक्रम देखनेमें नहीं, अपितु समाज, राष्ट्र और धर्मकी सेवा करने हेतु करेगी । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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बुद्धिवादी, अर्थात परम मूर्ख धर्मद्रोही ! ईश्‍वरको बुद्धिसे नहीं समझा जा सकता, तथापि बुद्धिवादी कहते हैं, “ईश्‍वर नहीं होता !“ यह बहुत बडी मूर्खता है !’ – –  परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : https://sanatanprabhat.org/

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हिन्दुओ ! स्वार्थके साथ-साथ राष्ट्र और धर्मका भी विचार करो ।

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युगों-युगोंसे संस्कृत व्याकरण वैसी ही है । उसमें किसीने कोई परिवर्तन नहीं किया है । कारण, वह आरम्भसे ही परिपूर्ण है । इसके विपरीत संसारकी सभी भाषाओंके व्याकरणमें परिवर्तन होते रहते हैं । –  परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : https://sanatanprabhat.org/

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शोध न माननेवाले कहते हैं हम ‘बुद्धिवादी’ ! ‘बुद्धिवादियोंने वैज्ञानिक उपकरणोंसे अध्यात्मको कभी असत्य सिद्ध नहीं किया है; परन्तु अध्यात्म विश्‍वविद्यालयने सैकडों वैज्ञानिक प्रयोगकर सिद्ध किया है कि ‘अध्यात्मशास्त्र चिरंतन सत्य है’ और इस बातका शोधप्रबन्ध भी अनेक राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनोंमें प्रस्तुत किया गया है । –  परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन […]

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राष्ट्र-धर्माभिमानियो ! मात्र अपने क्षेत्रके ही नहीं, अपितु व्यापक होनेके लिए वैद्यकीय, न्यायालयीन, पुलिस, सरकारी कार्यालय आदि सभी क्षेत्रोंमें हो रहे अन्याय ढूंढकर उनके विरुद्ध संवैधानिक मार्गसे आवाज उठाएं ! –  परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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गांवमें रहनेवाले निरोगी एवं आनन्दी, तो नगरमें रहनेवाले लोग व्याधिग्रस्त ! 


नगरोंमें रहनेवाले लोग मायाके अधीन जीवन व्यतीत करते हैं । अधिकतर इस माया चक्रमें ईश्वरको भूल जाते हैं । अनेक सुख-सुविधाओंके होनेके कारण उनके शरीरमें कार्य करनेकी प्रवृत्ति नहीं रहती । उसी प्रकार प्रलोभन एवं स्वार्थके कारण उनकी वृत्ति संकुचित एवं प्रेमभाव रहित हो जाती है । इससे उनके मनकी निर्मलता एवं आनन्दका लोप होकर, […]

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‘संघे शक्तिः कलौ युगे ।’ अर्थात ‘कलियुगमें संगठित रहनेमें ही शक्ति है ।’ इस सिद्धान्तके अनुसार, किसी विषयपर किसी संगठनका अकेले आंदोलन करनेकी तुलनामें अनेक संगठनोंका मिलकर जनजागृति हेतु वैध मार्गसे आंदोलन करना अधिक प्रभावशाली होता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : https://sanatanprabhat.org/

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