भारतके वीर सपूत, धर्मवीर, महापराक्रमी छत्रपति सम्भाजी महाराज


sambhaji maharajइस्लामी आक्रान्ताओंओंने भारतपर अनेक आक्रमण किए । भारतकी धनसंपदाको लूटा और भारतके हिन्दू राजाओं और उनकी प्रजाको डरा धमकाकर, उनपर धार्मिक कर, जजिया लगाकर तथा अनेकानेक अत्याचार कर उन्हें इस्लाम स्वीकार करनेको विवश किया । जिस भारतमें इस्लामका अंशमात्र नहीं था, उस भारतके कई राजा और प्रजा आक्रांताओंके भयसे धर्मपरिवर्तन कर लगे और भारतमें इसकारण इस्लामका प्रादुर्भाव हुआ । कुछ वीर भारत भूमिपर ऐसे भी थे, जो इस्लामके आगे नतमस्तक नहीं हुए, कुछने तो स्वयं तथा अपनोंपर किए गए अत्याचार सहन किए; परन्तु अपने धर्मपर अडिग रहे और अन्ततक लडते रहे  । ऐसे वीरोंमें महाराणा प्रताप, गुरु तेगबहादुर, शिवाजी तथा संभाजीराव भोसलेका नाम गर्वसे लिया जाता है । ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वादशीको महावीर, धर्मरक्षक संभाजी महाराजकी जयंती है, इस निमित्त हम उनके संघर्षपूर्ण किन्तु क्षात्रतेजयुक्त जीवन चरित्रके विषयमें जानेंगे ।
महाराज संभाजीराव भोसलेका जन्म ख्रिस्ताब्द १४ मई १६५७ को पुणेके पुरन्दर किलामें हुआ । आप शिवाजीराव महाराजके ज्येष्ठ पुत्र थे । जन्मसे ही उन्होंने अपने पिता शिवाजी महाराजको हिन्दुत्वके लिये मुगलोंसे युद्ध करते देखा था । ९ वर्षकी अल्पायुमें शिवाजी महाराज, उन्हें अपने साथ आगराके किलामें ले गए थे, जहां पिता-पुत्रको कपटसे औरंगजेबने बंदी बना लिया था । शिवाजी महाराजकी कूटनीतिके कारण दोना वहांसे निकलनेमें सफल हुए थे; अतः बाल्यकालमेंही संभाजीका औरंगजेबकी छलकपटकी नीतिसे परिचय हुआ था  । शिवाजी महाराजकी मृत्युके उपरान्त संभाजी महाराजका राज्याभिषेक ख्रिस्ताब्द १६८१ के जनवरी मासमें हुआ था । शिवाजी महाराजके  हिन्दवी राज्यकी नींवको संभाजी महाराजने और अधिक बलशाली बनाया । उनका राज्य पश्चिम महाराष्ट्र, कोकण, सह्याद्री पर्वतमालाओंसे नागपुरतक, उत्तर महाराष्ट्र, खानदेशसे दक्षिण भारतके तंजावरतक था ।
औरंगजेबकी दुष्ट दृष्टि शिवाजी महाराजके कालसे ही इस राज्यपर थी । ख्रिस्ताब्द १६८२ में औरंगजेबने मराठोंपर यह सोचकर आक्रमण किया कि उसकी विशाल सेना संभाजी महाराजको बहुत शीघ्र पराजित कर देगी । औरंगजेबने अपने पुत्र आजमको कोल्हापुर संभागमें ३ लाख अश्वारोही और ४ लाख सेनाके साथ आक्रमण करने भेजा । मराठे संख्यामें मुगलसेनासे अल्प होते हुए भी उनसे अधिक  अच्छे योद्धा थे, छद्मयुद्धमें (गुरिल्ला युद्धमें) प्रवीण थे; अतः मुगलोंको परास्त होना पडा । संभाजी महाराजका अपने आसपासके क्षेत्रोंमें वीरताका ऐसा प्रभाव था कि गोवाके पोर्तुगीज, जंजीराके सिद्धी और मैसूरके चिक्क्देव रायको संभाजीसे भय लगता था । इन शत्रुओंने संभाजी महाराजके भयसे औरंगजेबकी सहायता करनेका दुस्साहस कभी नहीं किया; अतः औरंगजेबका आक्रमण ६ वर्षतक विफल रहा ।
ख्रिस्ताब्द  १६८९ में संभाजी महाराजने कोकणके संगमेश्वरमें अपने महत्वपूर्ण सरदारोंकी एक बैठक की । ख्रिस्ताब्द १ फरवरी १६८९ को बैठक समाप्तिके पश्चात्  महाराज अपनी राजधानी रायगढकी लौट रहे थे । तभी अचानक मुकर्रब खानने ३००० सैनिकोके साथ आकर संभाजी महाराजको उनके ४०० सैनिकोंके साथ घेर लिया । महाराज घेरा तोडकर निकलनेमें सफल रहे; परंतु तुरन्त रायगढ न लौटते हुए  निकट किसी स्थानपर रुक गये ।  इतिहासमें, ‘घरका भेदी लंका ढाय’ यह कहावत सर्वविदित है । संभाजी महाराजका बहनोई गणोजी शिर्के घरका भेदी बना  ।  उनके बहनोई गणोजी शिर्केने औरंगजेबके सरदार मुकर्रब खानके साथ संभाजी महाराजपर अचानक पुनः आक्रमण कर दिया । मराठोंका संख्याबल वहांपर अतिशय न्यून था; क्योंकि इस षडयन्त्रका अतिशय गुप्त रीतिसे नियोजन किया गया था; अतः महाराज संभाजी और उनके सहयोगी कवि कलशको तथा उनके २५ विशिष्ठ सरदारोंके साथ बंदी बना लिया गया । बन्दी बनाकर संभाजी और कवि कलशको बहादुरगढ ले जाया गया । जहां औरंगजेबने संभाजी महाराजको अनेकानेक यंत्रणायें दी । उन्हें अनेक प्रकारसे अपमानित किया गया । उन्हें मुगलोंके सामने नतमस्तक होनेको कहा गया; परन्तु वे औरंगजेबको निडरतासे घूरते रहे । इसपर औरंगजेब सिहासनसे उतरकर उनके निकट आया । तब कवी कलशने कहा,` हे राजन, तुव तप तेज निहारके तखत त्यजो अवरंग ।” यह सुनकर औरंगजेबने कवि कलशकी जिव्हा काटनेका आदेश दिया ।  संभाजी महाराजको इस्लाम  स्वीकार करनेको कहा गया; परन्तु संभाजी महाराजने किसी भी परिस्थितिमें मुगलोंके आगे झुकनेसे और धर्मपरिवर्तनसे स्पष्ट मना कर दिया । तब औरंगजेबने उनपर यंत्रणा और अत्याचारोंकी पराकाष्टा कर दी । उनकी जिव्हा काट दी गयी और उनसे पुनः पूछा कि क्या उन्हें इस्लाम स्वीकार है ? तब संभाजी महाराजने जो अब बोल नहीं सकते थे, तो उन्होंने लिखकर दिया कि प्राण चले जाएं; किन्तु धर्मपरिवर्तन कभी नहीं करूंगा । इसपर क्रोधित एवं विक्षिप्त हिन्दुद्वेष्टा औरंगजेबने उनके नख ( नाखून ) हाथोंसे  विलग कर दिए । हमें नखमें कोई छोटासा कष्ट हो जाए तो सहन नहीं होता; परंतु हाथोंके नाखून खींचकर काटकर विलग करनेपर भी संभाजी डिगे नहीं । तब औरंगजेबने क्रोधमें विमूढ होकर उनके शरीरकी चरम(चमडी) छीलने जैसा कुकृत्य किया एवं उसके पश्चात् उसपर नमक छिडकवाया । उनके नेत्रोंमें शलाका उष्ण(गर्म) करके डाली गयी, नेत्र निकाल  दिए गए, मृत्यु तुल्य अनेक यातनाएं दी गईं । यह वीभत्स संहार १५ दिनतक लगातार चलता रहा; परन्तु संभाजी महाराजने धर्मपरिवर्तनकी सहमति नहीं दी तो, औरंगजेबने ख्रिस्ताब्द ११ मार्च १६८९ का दिवस महाराजकी मृत्यु हेतु चुना;  क्योंकि दूसरे दिन हिन्दू नववर्षकी प्रतिपदा थी । गांवके चौपालपर पहले कवि कलशकी गर्दन काट दी, तत्पश्चात् संभाजी महाराजके शरीरको खंडित किया गया, उनके मृत खण्डित देहकी यात्रा गांवके मार्गोंसे निकाली गई तथा उनकी मृतदेहके टुकडे तुलापुरकी नदीमें बहा दिए गए ।  कुछ इतिहासकार लिखते हैं कि उनके शरीरके क्षत-विक्षत अंग नदीसे निकालकर दहन संस्कार किया गया । कुछ इतिहासकारोंके मतानुसार औरंगजेबने नीचताकी पराकाष्टा करते हुए उनके क्षत-विक्षत अंगोंको कुत्तोंके समक्ष फेंक दिए ।
महाराज संभाजीरावको भले ही औरंगजेबने यातनाओंकी घोर पराकाष्टा करके उनकी नृशंस हत्या कर दी; परंतु औरंगजेब उनका धर्मपरिवर्तन करवानेमें पूर्णरूपेण असफल रहा । जब-जब भारतके ऐसे सच्चे सपूतोंको स्मरण किया  जायेगा, जिन्होंने अपनी मातृभूमि एवं अपने धर्मके लिए हंसते-हंसते प्राण न्योछावर कर दिए, तब-तब वीर संभाजी महाराजका नाम अतिशय सम्मानके साथ लिया जाता रहेगा ।



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