अधिकांश वर्ण ब्राह्मणोंद्वारा सत्य बतानेकी प्रवृत्ति नहीं रहनेके कारण ही हुई है, धर्म और राष्ट्रकी है यह दुर्दशा


अधिकांश वर्ण ब्राह्मणोंद्वारा सत्य बतानेकी प्रवृत्ति नहीं रहनेके कारण ही हुई है धर्म और राष्ट्रकी यह दुर्दशा
महाभारतके आदिपर्वमें कहा गया है –
नवनीतं हृदयं ब्राह्मणस्य वाचि क्षुरो निहितस्तीक्ष्णधार: ।
तदुभयमेतद्विपरीतं क्षत्रियस्य वाङ्गवनीतं हृदयं तीक्ष्णधारम् । ।   

अर्थात ब्राह्मणोंका (वर्ण-ब्राह्मण, जो मात्र जन्मसे नहीं अपितु कर्मसे भी ब्राह्मण हों) हृदय मक्खन जैसे कोमल होता है; किन्तु उनकी वाणी तीखी धारवाले छुरी (चाकू) जैसे कठोर होती है । क्षत्रियोंमें (वर्ण-क्षत्रिय अर्थात जिनके कर्म क्षत्रियों जैसे हों) यह दोनों बातें विपरीत होती हैं, अर्थात वाणी मृदु, परन्तु हृदय कठोर होता है । जबसे वर्ण ब्राह्मणोंने (अर्थात अध्यात्मविदों, धर्मज्ञों एवं सन्तोंने) समाजमें व्याप्त अधर्मके विषयमें मुखर होकर सत्य बतानेका कार्य छोड दिया है तबसे यह हिन्दू समाज अनियन्त्रित घोडे समान दिशाहीन होकर भटकने लगा है ।

अध्यात्मविदो और धर्मज्ञो, समाजको कटु सत्य बताना आरम्भ करें ! धर्मसंस्थापना तथा धर्मरक्षणार्थ सर्वप्रयास आरम्भ करें, अन्यथा आनेवाली पीढी, आपको कभी भी क्षमा नहीं करेगी । – तनुजा ठाकुर



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