धर्मधारा


एक आनन्दकी बात बताती हूं, सूक्ष्म इन्द्रियोंकी प्रक्रिया सीखने हेतु कुछ संन्यासियों, कथावाचकों एवं उच्च स्तरके साधकोंने जिज्ञासा दर्शाई है । वस्तुतः जो सात्त्विक और धर्माचरणी होते हैं, उनके लिए सूक्ष्म इन्द्रियोंकी प्रक्रियाको जागृत करना बहुत सरल होता है; क्योंकि उनके ऊपर मुख्यत: अहम् एवं थोडे प्रमाणमें पितृ-दोष और समष्टि स्तरपर कष्ट देनेवाली अनिष्ट शक्तियोंका आवरण होता है, वे जैसे ही छंटने लगते हैं, साधनाका तेज प्रस्फुटित होने लगता है और सूक्ष्म इन्द्रियां जागृत होने लगती हैं । मुझे भगवानजीने पहले ही बताया था कि आगे बहुतसे उच्च कोटिके साधक जीव उपासनाके मार्गदर्शनमें साधना करेंगे, सम्भवतः वह काल आने लगा है । वैसे इस कलाको सिखानेकी मूर्खतापूर्ण धृष्टता करनेका मुझे प्रथम परिणाम मिल चुका है, अभी आठ दिवस पूर्व ही, मृत्युतुल्य कष्ट झेलकर उठी हूं, कष्ट समाप्त होनेके आज आठ दिवस पश्चात भी अभीतक चल-फिर नहीं पा रही हूं, न बैठ पा रही हूं, न सो पा रही हूं, भोजन देखकर ही मितली आती है; अतः उसे ग्रहण करनेकी बात जाने दें; इसलिए शक्ति भी पुनः संचारित नहीं हो पाती है, औषधि एवं सर्व घरेलू प्रयास निरर्थक हैं, मुझे ज्ञात है कारण सूक्ष्म है; इसलिए धैर्य धारण कर सहन कर रही हूं । आठ दिवस तीव्र ज्वर और भिन्न प्रकारके कष्टसे पीडित थी (इस सूक्ष्म युद्धकी विस्तृत सूचना इस ‘मासिक’में थोडीसी प्रकाशित करनेका प्रयास किया है, शेष पुनः साझा करूंगी) और अब गत आठ दिवससे ऐसे ही ‘बेसुध’ पडी रहती हूं; किन्तु ईश्वरीय कृपाके गिरते-पडते, जो अति आवश्यक होता है, वह कर पाती हूं !



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