धर्मधारा


एक व्यक्तिने मुझसे पूछा है, “स्त्री सशक्तिकरणके लिए आप क्या कर रही हैं ?”
मैंने कहा, “पुरुषोंको साधना और धर्माचरण सिखा रही हूं, जिस समाजका पुरुष साधक बन जाए, उस समाजमें स्त्री सशक्तिकरणकी आवश्यकता ही नहीं होती है, वहां स्त्रीको सर्व सम्मान एवं अधिकार स्वतः ही प्राप्त होता है, ऐसे समाजमें यदि कोई पुरुष अपने किसी दोषसे आवेशित होकर किसी स्त्रीके साथ अन्याय करे तो आदर्श पुरुष उन्हें दण्ड देकर समाजको ऐसे कुकृत्य न करनेकी सीख देता है। रामायण और महाभारत युद्धमें भगवान राम और कृष्ण दोनोंने ऐसा कर, एक आदर्श पुरुषकी व्याख्याको परिभाषित किया है !”
 खरा पुरुष किसी भी स्त्रीके साथ कभी भी अन्याय नहीं करता, अपनी पत्नीको सहधर्मिणी समझकर उसे समान अधिकार देता है, उसके सर्व सुख एवं साधनका ध्यान देते हुए साधना पथपर अग्रसर करता है, वह परस्त्रीको माता मानता है, उसकी आज्ञाका पालन करता है, अपनी और दूसरोंकी पुत्रीको दुर्गाके स्वरूपमें मानकर उनकी कन्याके रूपमें पूजा करता है, अपनी पुत्रीकी विद्या अर्जनकी व्यवस्था कर, युवा होनेपर उसकी योग्यता अनुरूप स्त्री धन देकर, योग्य कुलमें विवाह कर, उसका भविष्य सुरक्षित करता है, यह है हमारे यहां पुरुषका स्त्रीके प्रति धर्म, ऐसा पुरुष किसी भी स्त्रीके साथ अन्याय कैसे कर सकता है ?
आज समाजमें स्त्रियोंके साथ जो भी अत्याचार हो रहा है वे अधर्मी, पापी, वासनान्ध नराधम करते हैं।  यदि पुरुष सदाचारी, धर्माचरणी और साधक प्रवृत्तिका हो जाए तो आजके समाजकी सौ प्रतिशत समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। हमारे हिन्दू धर्ममें स्त्रियोंको विवाह पूर्व पिताके संरक्षणमें, विवाह पश्चात पतिके और विधवा होनेपर पुत्रके संरक्षणमें रहनेका सिद्धान्त बताया गया है। अर्थात यदि ये तीनों धर्माचरण करेंगे तो स्त्री, पुरुषके संरक्षणमें रहकर स्वयं धर्मपालन करेंगी, वे अपनी स्त्री सुलभ मर्यादाको तोड कर नंगा नाच क्यों करेंगी या उनके विरुद्ध अपना मुख क्यों खोलेंगी ? स्त्री सशक्तिकरण यह विदेशी शब्द है, हमारे यहां तो शिव, अपनी स्त्री, माता पार्वतीकी शक्तिके कारण ही क्रियाशील रहते हैं अन्यथा वे शव (निर्गुण ब्रह्म) बन जाते हैं ! ऐसे सभ्य समाजमें स्त्री सशक्तिकरण शब्द ही निरर्थक है ! हिन्दू राष्ट्रमें इन शब्दोंका कोई अर्थ नहीं होगा !
वैसे मैंने अपने पिता और गुरुके संरक्षणमें इन तत्त्वोंकी अनुभूति ली है, बिना अनुभवके कोई उपदेश या ज्ञान मैं नहीं बांटती ! मेरे पिता और गुरुने मुझे धर्म और साधनाका ज्ञान देकर स्त्रीकी मर्यादाकी सीख देकर मुझे सर्व धर्म अधिष्ठित अधिकार दिए और मैंने उन अधिकारोंको ईश्वरको साक्षी मानकर कभी भी उनका दुरुपयोग नहीं किया है !
ध्यान रहे, धर्मनिष्ठ पुरुषका संरक्षण, एक धर्माचरणी स्त्री सदैव सहर्ष स्वीकार करती है; क्योंकि उसमें अनुसरण/अनुगमन और समर्पणके गुण ईश्वर प्रदत्त होते हैं | किन्तु भ्रष्टाचारी, अहंकारी, वासनान्ध, निधर्मी और स्वैराचारी पुरुषका अनुगमन कर उसे क्या कोई लौकिक या पारलौकिक सुख मिल सकता है ?; अतः वे उनका परित्याग करती हैं और इसका अधिकार भी हमारा धर्म देता है।
स्त्री सशक्तिकरणके नामपर आज जो स्त्री स्वतन्त्रता शब्द प्रचलित है और उसकी आडमें जो स्वैराचार हो रहा है उससे समाजमें उच्छृंखलताओंने जन्म लिया है ! अतः स्त्रीको सुरक्षित, सशक्त करने हेतु पुरुषको साधक बनाएं, यह शाश्वत सिद्धान्त है !


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2017. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution