सुख और विद्याका एक साथ संगम सम्भव नहीं !


सुखार्थिनः कुतो विद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् ।
सुखार्थी वा त्यजेत् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥ – विदुर निति
अर्थ : सुख चाहनेवालेसे विद्या दूर रहती है और विद्या चाहनेवालेसे सुख; इसलिए जिसे सुख चाहिए, वह विद्याको छोड दे और जिसे विद्या चाहिए, वह सुखको त्याग दे !
सा विद्या या मुक्तये‘, यह विद्याकी परिभाषा है अर्थात जो साधन मुक्ति प्रदान करें, वह विद्या है; इसप्रकार विद्याप्राप्ति हेतु प्रयत्नशील जीवात्माको साधक कह सकते हैं । साधना करते समय इस श्लोकका स्मरण सभी साधकोंने रखना चाहिए । यदि द्रुत गतिसे आध्यात्मिक प्रगति करनी है, तो सुखका त्याग करना ही होता है । जैसे दूरदर्शन सञ्चपर यदि हमारा कोई प्रिय कार्यक्रमका प्रसारण हो रहा हो और उसे देखनेसे हमें सुख मिलता हो तो उसका त्याग कर नामजप करना, सत्सेवा करना, यह आध्यात्मिक प्रगति हेतु पूरक होता है । उसी प्रकार जो व्यक्ति मायाके सुख-संसाधनोंमें लिप्त रहता है, उसे न ही ईश्वर, न ही कोई गुरु या सन्त, स्वयं या किसीके माध्यमसे साधना सिखाते हैं; इस प्रकार वह आत्मज्ञान देनेवाले शास्त्र, अध्यात्मशास्त्रसे दूर रहता है और परिणामस्वरूप जीवन-मृत्युके चक्रमें बद्ध रहता है और मायाके सुखको सर्वोपरि मानना ही अविद्या है तो आप समझ गए होंगे कि महात्मा विदुरने उपर्युक्त श्लोकमें जो सूत्र प्रतिपादित किए हैं, वह सत्य अधिष्ठित है ।



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