एक पाठकने प्रश्न किया है, आप अपने लेखनमें एक विषयसे सम्बन्धित लेखको एक ही बार लिखकर क्यों नहीं प्रकाशित कर देती हैं, उसे छोटे-छोटे भागमें क्यों प्रकाशित करती हैं ?
उत्तर : भारतमें पिछले २१ वर्षोंसे धर्मप्रसार कर रही हूं और मैंने पाया है कि यहांके लोगोंमें धर्म और अध्यात्म सीखनेकी जिज्ञासा बहुत अल्प (कम) है, हां ! अहम् अधिक होनेके कारण सिखानेकी वृत्ति बहुत अधिक है, इसलिए यहां गुरु अधिक और शिष्य या साधक, शेष भारतकी तुलनामें अपेक्षाकृत बहुत ही न्यून (कम) मिलेंगे !
वृत्तिसे भोगी होनेके कारण उनके पास धर्म और अध्यात्मके लिए समय नहीं होता है; इसलिए बडे लेख पढने हेतु बहुत ही कम लोग उत्सुक होते हैं । इसलिए मैंने छोटे-छोटे उद्बोधन एवं सुवचनोंके माध्यमसे लोगोंमें धर्म और अध्यात्मके प्रति जिज्ञासा निर्माण करने हेतु यह प्रक्रिया आरम्भ की है और ईश्वरीय कृपासे मैं इसमें सफल भी हुई हूं; क्योंकि पिछले वर्ष (२०१७ में) ‘साइनस’के कारण मैं धर्मधारा सत्संगके नूतन प्रतियोंका ध्वनिमुद्रण नहीं के बराबर कर पाई, ऐसेमें जागृत भवके १% सदस्योंने भी गुटका त्याग नहीं किया; क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि प्रातःकाल पंचांगके साथ कुछ नूतन विषय अवश्य ही बताए जाएंगे । दूसरी बात यह है कि हिन्दू धर्मका ज्ञान एक अगाध महासागर समान है जिसका कोई ओर-छोर नहीं है, ऐसेमें जितना भी लिखा जाए तो अल्प ही होता है । छोटे-छोटे सुवचनोंसे मैं भी उस विषयपर और गहन चिन्तन कर पाती हूं । इस प्रक्रियामें मैं भी कुछ न कुछ सीखती ही हूं । तीसरा कारण यह है कि धर्माचरण और साधनाके अभावमें समाजकी सात्त्विकता घट चुकी है; अतः उसे धर्म और अध्यात्मके गूढ तत्त्वोंको आत्मसात करना कठिन होता है; इसलिए सुवचनोंकी छोटी-छोटी ‘टिकिया’से उन्हें धर्म और अध्यात्मकी ओर प्रवृत्त करनेका एक तुच्छ-सा प्रयास इन माध्यमोंसे करती हूं । और आनन्दकी बात यह है कि whatsappके प्रथम गुटमें हमने अगस्त २०१५ में मात्र बीस लोगोंको जोडा था और आज ‘कमसे कम’ २० लाख लोग तो हमारे लेखोंको अवश्य ही पढते हैं, यह हिन्दू धर्मके चैतन्य और ज्ञानका प्रभाव है । सबसे आनन्दकी बात यह है कि इनमें अधिकांश बुद्धिजीवी वर्ग हैं ! (१.६.२०१८)
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