नव वर्षारम्भ या संवत्सरारम्भ या गुडी पडवा


चैत्र मासकी शुक्ल प्रतिपदाको गुडी पडवा या वर्ष प्रतिपदा या उगादि (युगादि) कहा जाता है । इस दिन हिन्दू नववर्षका आरम्भ होता है । ‘गुडी’का अर्थ ‘विजय पताका’ होता है । ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दोंकी सन्धिसे बना है ‘युगादि‘ । आन्ध्र प्रदेश और कर्नाटकमें ‘उगादि‘ और महाराष्ट्रमें यह पर्व गुडी पडवाके रूपमें मनाया जाता है । इसी दिनसे नूतन संवत्सर आरम्भ होता है; अत: इस तिथिको ‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं । इस वर्ष त्यौहार यह २८ मार्चको है ।

भारतीय संवत्सरमें मासोंके नाम वैज्ञानिक रीतिसे, आकाशीय नक्षत्रोंके उदय-अस्त होनेके अधारपर रखे गए थे । हमारा भारतीय नववर्ष ३१ दिसम्बरको रात्रिके बारह बजे नहीं; अपितु चैत्र शुक्ल प्रतिपदापर सूर्योदयसे मनाया जाता है, जब आकाशके सभी ग्रह-नक्षत्र पृथ्वीपर अपनी कृपादृष्टि डालते हैं और अब तो पाश्चात्य विद्वान भी ग्रहोंके प्रभावको स्वीकार कर चुके हैं । नववर्ष प्रतिपदाको स्वयंसिद्ध मुहूर्तोंमेंसे एक माना जाता है इसी कारण इस दिन कोई भी शुभकार्य बिना मुहूर्त देखे प्रारम्भ किया जा सकता है, जबकि अन्य दिनोंमें कार्य विशेषके लिए मुहूर्त निकाला जाता है ।

हिन्दू वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे, व्यापारी वर्ष कार्तिक शुक्ल प्रतिपदासे आरम्भ होता है । सौर वर्ष, चन्द्र वर्ष व सौर-चन्द्र वर्ष (लूनी सोलर), इन वर्षोंके भी भिन्न-भिन्न वर्षारम्भ है । वर्ष बारह मासका ही क्यों होना चाहिए ? इसका उत्तर वेदोंमें है । वेद अतिप्राचीन वाङ्‌मय है, इसमें कोई मतभेद नहीं । `द्वादशमासै: संवत्सर: ।’ ऐसा वेदवचन है । वेदोंने कहा, इसलिए वह जगत्मान्य हुआ ।

मास-गणनामें वैशाख आदिकी अपेक्षा सर्वप्रथम चैत्र क्यों लिया गया, इस विषयमें शास्त्रोंमें कहा गया है कि सृष्टिके आरम्भमें (अथवा ज्योतिर्गणना प्रारम्भ) चन्द्रमा चित्रापर था (और चित्रा चैत्रीको प्रायः होती ही है;) इस कारण अन्य महीनोंकी अपेक्षा चैत्र प्रथम मास माना गया है और इसके पीछे वैशाख आदि आते हैं । इस सम्बन्धमें यह भी ज्ञातव्य है कि जिस प्रकार चैत्रीको चित्रा होना सम्भव माना गया है, उसी प्रकार वैशाखीको विशाखा, ज्येष्ठीको ज्येष्ठा, आषाढीको पूर्वाषाढा, श्रावणीको श्रवण, भाद्रीको पूर्वा-भाद्रपद, आश्विनीको अश्विनी, कार्तिकीको कृत्तिका, मार्गशीर्षीको मृगशिरा, पौषीको पुष्य, माघीको मघा और फाल्गुनीको पूर्वाफाल्गुनी होना भी सम्भव सूचित किया गया है ।

१ जनवरीको वर्षारम्भ करनेका कोई कारण नहीं है । किसीने निश्चित किया और वह आरम्भ हो गया । इसके विपरीत, चैत्र शुक्ल प्रतिपदापर वर्षारम्भ करनेके नैसर्गिक, ऐतिहासिक, आध्यात्मिक कारण हैं ।

अ. नैसर्गिक : चैत्र ही एक ऐसा महीना है, जिसमें वृक्ष तथा लताएं पल्लवित व पुष्पित होती हैं। शुक्ल प्रतिपदाका दिन चन्द्रमाकी कलाका प्रथम दिवस माना जाता है । जीवनका मुख्य आधार वनस्पतियोंको सोमरस चन्द्रमा ही प्रदान करता है। इसे औषधियों और वनस्पतियोंका राजा कहा गया है । इसीलिए इस दिनको वर्षारम्भ माना जाता है।

आ. ऐतिहासिक :

१. मर्यादा पुरुषोत्त म प्रभु श्रीरामका राज्याभिषेक

२. युगाब्द (युधिष्ठि र संवत्) का आरम्भष

३. उज्जबयिनी सम्राट – विक्रमादित्य्द्वारा विक्रमी संवत् प्रारम्भं

४. शालिवाहन शक संवत् (भारत सरकारका राष्ट्री य पंचांग)

५. इस दिन रामने वालीका वध किया ।

६. शकोंने प्राचीनकालमें शकद्वीपपर रहनेवाली एक जाति हूणोंको (एक घुमन्तु

जाति, दूसरी शताब्दीमें चीनके आसपास इनका मूल निवासस्थान था ।) पराजित कर विजय प्राप्त की ।

७. महान गणितज्ञ भास्कराचार्यने इसी दिनसे सूर्योदयसे सूर्यास्ततक दिन, मास और वर्षकी गणना करते हुए ‘पंचांग’की रचना की ।

इ. आध्यात्मिक

१. सृष्टिकी निर्मिति : ब्रह्मदेवने इस दिन सृष्टिका निर्माण किया अर्थात् यहींसे सत्ययुगका आरम्भ हुआ । इसी कारण इस दिन वर्षारम्भ किया जाता है ।

२. प्रान्तानुसार उत्सव मनानेकी पद्धति : संवत्सरारम्भ महाराष्ट्रमें गुडीपाडवाके रूपमें मनाया जाता है । आन्ध्रमें उसे युगादि (तेलगू नववर्ष) कहते हैं । दक्षिण भारतमें शालिवाहन शक इस दिनसे प्रारम्भ होता है ।

३. साढेतीन मुहूर्तोंमें एक : संवत्सरारम्भ, अक्षय तृतीया व दशहरा, प्रत्येकका एक व कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाका आधा, ऐसे साढे तीन मुहूर्त हैं । इन साढे तीन मुहूर्तोंकी विशेषता यह है कि अन्य दिनों शुभकार्य हेतु मुहूर्त देखना पडता है; परन्तु इन चार दिनोंका प्रत्येक क्षण शुभमुहूर्त ही होता है ।

४. मां दुर्गाकी उपासनाकी नवरात्र व्रतका प्रारम्भक

नववर्ष रुपी इस त्योहारको मनानेकी पद्धति क्या है ?

अ. अभ्यंगस्नान (मांगलिक स्नान) : इस दिन प्रात: शीघ्र उठकर प्रथम अभ्यंगस्नान करते हैं । अभ्यंगस्नान अर्थात् शरीरको तेल लगाकर, मर्दन (मालिश) कर, उसे त्वचामें सोखकर तदुपरान्त गुनगुने जलसे स्नान करना । स्नानके कारण रज-तम गुण एक लक्षांश न्यून होते हैं व सत्त्वगुण उसी मात्रामें बढता है । नित्यके नके कारण उनका प्रभाव लगभग तीन घण्टोंतक टिकता है, जबकि अभ्यंगस्नानके कारण चारसे पांच घण्टोंतक टिकता है ।

आ. देशकालकथनका महत्त्व : अभ्यंगस्नान करते समय देशकालकथन करना पडता है ।

ब्रह्मदेवके जन्मसे लेकर अबतक ब्रह्मदेवके कितने वर्ष हो गए ? किस वर्षका कौनसा व कितना मन्वन्तर चल रहा है ? इस मन्वन्तरको कितने महायुग व उस महायुगका कौनसा उपयुग चल रहा है ? इन सबका उसमें उल्लेख रहता है । इसप्रकार देशकालकथन करना होता है ।

इ. वन्दनवार लगाना : स्नानोपरान्त आम्रपल्लवोंका वन्दनवार बना कर, लाल पुष्पोंके साथ प्रत्येक द्वारपर बांधते हैं; क्योंकि लाल रंग शुभदर्शक है ।

ई. संवत्सर पूजा : प्रथम नित्यकर्म देवपूजा करते हैं । `वर्ष प्रतिपदाके दिन महाशान्ति करते हैं । शान्तिके प्रारम्भमें ब्रह्मदेवकी पूजा करते हैं; क्योंकि इस दिन ब्रह्मदेवने विश्वकी निर्मितिकी थी । पूजामें उन्हें दौना (कटावदार तेज सुगन्धवाला पत्ता) चढाते हैं । तदुपरान्त होमहवन करते हैं । तदुपरान्त अनन्त रूपोंमें अवतरित विष्णुकी पूजा करते हैं । `नमस्ते ब्रह्मरुपाय विष्णवे नम: ।’, इस मन्त्रका उच्चारण कर उन्हें नमस्कार करते हैं व तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको दक्षिणा देते हैं । सम्भव हो, तो इतिहास, पुराण इत्यादि ग्रन्थ ब्राह्मणको दान देते हैं । यह शान्ति करनेसे सर्व पापोंका नाश होता है, दुर्घटना नहीं होती, आयु बढती है व धन-धान्यकी समृद्धि होती है, ऐसे कहा गया है ।

उ. ध्वजा खडी करना

ध्वजाके अन्य नाम : ब्रह्मदेवने इस दिन सृष्टिनिर्मिति की, इसलिए धर्मशास्त्रमें इस ध्वजको `ब्रह्मध्वज’ कहा गया है । इसे कुछ लोग `इन्द्रध्वजके’ नामसे भी सम्बोधित करते हैं ।

पद्धति : लम्बे बांसके ऊंचे सिरेपर हरी या पीली जरीवाली चोलीका वस्त्र बांधते हैं । उसपर शक्करके पदक (बताशे), नीमकी कोमल पत्तियां, आमकी डाली व लाल पुष्पोंका हार बांधकर उसपर चांदी व ताम्बेका कलश सजाकर ध्वजा उभारी जाती है । उसके सम्मुख सुन्दर रंगोली बनाई जाती है । नूतन वर्षके स्वागत हेतु प्रत्येक व्यक्ति उत्सुक होता है । ब्रह्मध्वजाय नम: । बोलकर इस ध्वजाकी संकल्पपूर्वक पूजाकी जाती है । सूर्यास्तके समय गुडका नैवेद्य दिखाकर ध्वजा उतारते हैं ।

लाभ : ध्वजाके कारण वातावरणसे प्रजापति-संयुक्त तरंगें इस कलशरूपी सूत्रकी सहायतासे घरमें प्रवेश करती हैं । (दूरदर्शनका ऐंटेना जैसे कार्य करता है, उसी प्रकार है यह) अगले दिनसे इस कलशसे जल पीएं । प्रजापति तरंगोंसे संस्कारित कलश पीनेके जलपर उसी प्रकारके संस्कार करता है । अतएव हमें प्रजापति तरंगें वर्षभर प्राप्त होती हैं ।

पंचांगश्रवणका लाभ : ज्योतिषका पूजन कर उससे या उपाध्यायसे नए वर्षका पंचांग अर्थात् वर्षफल श्रवण करते हैं । तिथिके श्रवणसे लक्ष्मी प्राप्त होती है, वारोंके श्रवणसे आयु बढती है, नक्षत्रश्रवणसे पापोंका नाश होता है, योगश्रवणसे रोग दूर होता है, करणश्रवणसे निर्धारित कार्य साध्य होते हैं । ऐसा उत्तम फल है इस पंचांगश्रवणका । इसके नित्य श्रवणसे गंगास्नानका फल मिलता है ।

नीमकी पत्तियोंका प्रसाद :

महत्त्व : अन्य किसी भी पदार्थकी अपेक्षा नीममें प्रजापति तरंगें ग्रहण करनेकी क्षमता अधिक होनेके कारण उस दिन नीमका प्रसाद खाया जाता है ।

कृति : मंत्रके आवर्त्तन करते हुए नीमके पुष्प, कोमल पत्ते, चनेकी भीगी दाल या भिगोए गए चने, शहद, जीरा व थोडीसी हींग एक साथ मिलाकर प्रसाद तैयार करें व सभीको बांटें । (उपर्युक्त लेखका अधिकांश भाग सनातन संस्थाके ग्रन्थ व्रत, त्यौहार एवं धार्मिक उत्सवसे उधृत है )

 



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