विद्यार्थियोंको क्यों सिखाया जाए स्वभावदोष निर्मूलन (भाग – २)


आजका विद्यार्थी ही कलका गृहस्थ बनता है । यदि ब्रह्मचर्य आश्रममें (विद्यार्थी जीवनमें) दोष निर्मूलन प्रक्रिया सिखाई जाए तो ऐसे विद्यार्थियोंका जीवन सुखी होगा और वे अच्छे नागरिक, अच्छे पति या पत्नी, माता या पिता, पुत्र या पुत्री सिद्ध होंगे ।
वर्तमान कालमें अधिकांश युवक या युवती जैसे ही वैवाहिक जीवनमें प्रवेश करते हैं, उनमें अनके प्रकारके वैचारिक मतभेद आरम्भ हो जाते हैं, जो स्वाभाविक भी है; क्योंकि दो भिन्न कुलों एवं संस्कारोंमें पले होते हैं; किन्तु समस्या तब भयवाह रूप ले लेती है जब दोनोंमें कोई भी परेच्छासे कुछ भी करनेको या किसी भी प्रसंगमें झुकनेको सिद्ध नहीं होते हैं जबकि विवाह रुपी संस्था परेच्छाको अंगीकृत करनेका सुन्दर माध्यम है और इससे अहंको न्यून करनेमें गति मिलती है । आज भारत जैसे सुसंस्कृत देशमें सम्बन्ध विच्छेद बढनेका मुख्य कारण साधकत्वका अभाव है । स्वार्थी और अहंकारी व्यक्तियोंका वैवाहिक जीवन कभी सुखी नहीं हो सकता है; क्योंकि गृहस्थ जीवनको एक आश्रमकी संज्ञा दी गयी है और आश्रम जीवन आनंदपूर्वक व्यतीत करने हेतु त्याग और विनम्रता इन दोनों गुणोंका होना परम आवश्यक होता है, यह छोटी सी और महत्त्वपूर्ण बात न तो आजके माता-पिताको और न ही आजककी निधर्मी शिक्षण व्यवस्थाको समझमें आती है; परिणामस्वरूप आजका उच्च शिक्षित हो या अल्प शिक्षित व्यक्ति सभी अपने जीवनमें पग-पगपर अपने दोषों और अहंकारके कारण ठोकर खाते हैं एवं दु:खी होते हैं । स्वाभावदोष निर्मूलन प्रक्रियासे व्यक्ति अंतर्मुखी बनता है एवं वह दिव्य गुणोंको आत्मसात करने हेतु सतत प्रयास करता है ।
उपासनाके आश्रममें दो वर्ष पूर्व कनाडासे एक महिला आई थी, उन्होंने स्वीकार किया कि आज उनके पति और दो पुत्रियोंके होनेके पश्चात् भी वे एकाकी हैं और अब वृद्धावस्थामें स्वास्थ्य ठीक न रहनेसे उन्हें भविष्यकी चिन्ता सताने लगी है । उन्होंने अपनी चूक स्वीकार करते हुए कहा कि मैं ही अत्यधिक स्वार्थी हो गयी थी; अतः अपने पति एवं बच्चोंको एक छतके नीचे संभालकर नहीं रख पाई, मैंने सदैव अपने विषयमें ही सोचा; अपने अहंकी पुष्टि करती रही । उन्होंने कहा कि आपके लेखोंको पढनेके पश्चात् मुझे ज्ञात हुआ कि मैं कितनी अहंकारी हूं और आज मेरी दयनीय स्थिति मात्र मेरे अहंकार और स्वार्थके कारण हुआ है । यह तो मैंने एक प्रकरण बताया है, आज अनेक घरोंमें कलह क्लेशका कारण अहंकार, अधिकार जताना और स्वयंके विषयमें विचार करना है ।
हमारे श्रीगुरुने एक बार बहुत अच्छी बात कही थी कि साधकका कोई अधिकार नहीं होता, मात्र कर्तव्य होता है ! आज यदि समाजका प्रत्येक व्यक्ति इस तथ्यको अंगीकृत कर ले तो इस समाजका कायाकल्प हो जाए; किन्तु आज सभीको मात्र अपने अधिकार ज्ञात हैं, कर्तव्य ज्ञात होते हुए भी वे इसका पालन नहीं करते हैं । पूर्व कालमें हमारे यहां कुटुंब व्यवस्था थी, एक छतके नीचे सौसे अधिक लोग रहते थे और सब प्रेमसे रहते थे; क्योंकि सभी पूर्ण निष्ठासे अपने कर्तव्योंका पालन करते थे और कर्तव्य पालनके क्रममें वे अपने सुख-उपभोग सभीका सहज ही त्याग करते थे; इसलिए वे सम्मानके अधिकारी होते थे और सभी उनसे प्रेम करते थे ।
यदि हम बाल्यकालसे विद्यार्थीमें कर्तव्य पालनका संस्कार डालें तो क्या वह वृद्ध माता-पिताको कभी वृद्धाश्रममें छोडेगा, क्या वह अपनी पत्नी या पतिके प्रति तथा अपनी संतानोंके प्रति अपने कर्तव्यका त्याग कर स्वयंके सुख हेतु सम्बन्ध विच्छेद कर दूसरेसे विवाह करेगा ? अहंकारी और स्वार्थी व्यक्ति दूसरे विवाहसे भी कहां सुख पाता है, पाश्चत्य देशके लोग अनेक बार विवाह करते हैं; किन्तु सुख उन्हें प्राप्त नहीं होता; क्योंकि अहंकार और स्वार्थके कारण वे अपने किसी भी सम्बन्धको टिका कर नहीं रख पाते हैं; फलस्वरूप पशु समान अपनी स्वार्थ और वासना तृप्ति हेतु अपना साथी परिवर्तित करते रहते हैं ।
अतः विद्यार्थियोंमें दिव्य गुण आत्मसात हो; इसलिए उन्हें दोष निर्मूलन प्रक्रिया सिखाना अनिवार्य है; किन्तु इस हेतु माता-पिता एवं शिक्षकोंको यह प्रक्रिया सर्वप्रथम करनी होगी, क्योंकि बच्चे तो अनुकरणप्रिय होते हैं, वे बडोंको देखकर ही सीखते हैं । – तनुजा ठाकुर  (८.१०.२०१७)



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