गीता सार-सर्वत्र ब्रह्म स्वरूपकी प्रचीति


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विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
अर्थ : वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मणमें तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं| – श्रीमद भगवद्गीता (५:१८)
भावार्थ : स्थितप्रज्ञताको प्राप्त व्यक्ति समदर्शी हो जाते हैं अर्थात उन्हें सभीमें ईश्वरके स्वरूपका दर्शन होने लगता है | उनमें भेदभावकी व्याप्ति समाप्त हो जाती है | ऐसे अनेक आत्मदर्शी विभूतियोंके प्रसंग हम सभीको ज्ञात हैं | जैसे एक बार महाराष्ट्रके एक संत गंगाजल लेकर रामेश्वरममें चढाने जा रहे थे | मार्गमें ही उन्हें एक गधा दिखा जो प्याससे तडप रहा था उन्होंने उसे उस जलको पला दिया और उस समय उन्हें उसमें ईश्वरीय स्वरूपके दर्शन भी हुए | उसी प्रकार रामकृष्ण परमहंसको अपनी धर्मपत्नीमें मां कालीके स्वरूपका भान होता था | एक संत तो एक ही पत्तलमें एक कुत्तेके साथ आनंदमें भोजन करते हुए भी देखे गए थे | चाहे कोई बुद्धिजीवी हो या कोई मूढ, ईश्वरीय तत्त्व सभीमें एक समान होता है मात्र उसके मन, बुद्धि एवं अहंके आवरण ही उसे बुद्धिजीवी या मूढ बनाता है | समदर्शी उस आवरणके नीचे व्याप्त आत्मतत्त्वकी अनुभूति ले सकते हैं अतः उन्हें सभी एक समान दिखते हैं | सर्वत्र ब्रह्म स्वरूपकी प्रचीति तभी साध्य हो सकती है जब उस योगीने अद्वैतकी स्थितिको साध्य कर लिया हो | यह सम्पूर्ण सृष्टि ब्रह्म तत्त्वसे निर्मित हुई है और सभीमें भेद त्रिगुणके (सत्त्व, रज और तम) भिन्न अनुपातके कारण ही है, तात्पर्य यह है कि यह सम्पूर्ण सृष्टि त्रिगुण आधारित है और मात्र त्रिगुणातीत स्थितिको प्राप्त योगी ही सर्वत्र ब्रह्मके दर्शन कर सकता है | ऐसे योगियोंको सामान्य बुद्धिसे पहचाना भी कठिन होता है |

-तनुजा ठाकुर



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