नायडूकी भटके हिन्दुओंको शिक्षा, भारतीयोंको पश्चिमोन्मुखी जीवन शैली छोड देनी चाहिए !


जनवरी १३, २०१९

उपराष्ट्रपति एम.वेंकैया नायडूने ‘पश्चिमोन्मुखी जीवन पद्धति’ छोडकर स्वस्थ भोजन और जीवनयापनकी भारतीय परम्पराओंकी ओर लौटनेका रविवार, १३ जनवरीको आह्वान किया । नायडूने यहां ‘स्वर्ण भारत ट्रस्ट’ (एसबीटी) शाखाके दूसरे वर्षगांठ समारोहके समय कहा कि यह समय है जब भारतीयोंने अपनी जीवन शैलीमें परिवर्तन करें और स्वस्थ जीवनके पारम्परिक ढंगपर वापस लौटें । उन्होंने कहा, ‘‘हमें अपने पूर्वजोंकी परम्पराओं और प्रथाओंका पालन करने और पश्चिम-उन्मुख जीवन शैलीका त्याग करनेकी आवश्यकता है ।’’ उपराष्ट्रपतिने कहा कि पारम्परिक खाद्य शैली और रीतियां न केवल परीक्षणपर उत्तम सिद्ध होते हैं, वरन ये आरोग्य भी होते हैं; क्योंकि ये प्रत्येक ऋतु और क्षेत्रकी आवश्यकताओंके अनुरूप होते हैं । उन्होंने कहा, ‘‘हमें जीवन जीनेके अपने सरल; किन्तु प्रभावी ढंगसे स्वस्थ आहारकी आदतों और जीवन शैलीको अपनानेके लिए युवाओंको जागरूक करने और शिक्षित करनेकी आवश्यकता है ।’’ नायडूने कहा, ‘‘सहभागिता और देखभाल भारतीय दर्शनका मूल है । ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ (समूचा विश्व एक परिवार है), ‘सर्व जन सुखिनो भवन्तु’ (सभीको प्रसन्न रहने दें), यह दर्शन भारतकी महानता है ।’’ उपराष्ट्रपतिने कहा, ‘‘सभी टॉम, डिक और हैरीने आकर हमपर आक्रमण किया, हम लोगों पर शासन किया, हमें नष्ट किया, हमें लूटा और हमें धोखा दिया, यहां तक कि छोटे देशोंको भी । भारतने कभी किसी देशपर आक्रमण नहीं किया ।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हिन्दू संस्कृति, भारतीयता बहुत सहिष्णु हैं । यह सभीका विकास चाहती है ।’’ उन्होंने दोहराया कि क्षेत्रीय भाषाओंको संरक्षित किया जाना चाहिए । इस अवसरपर केन्द्रीय कानून मन्त्री रविशंकर प्रसादने यहां विश्व स्तरीय संस्थाके रूपमें ‘एसबीटी परिसर’की प्रशंसा की ।

 

 

“ईश्वरने सनातनियोंको भोगसे योगकी यात्राके लिए इतने सुन्दर माध्यम प्रदान किए है कि वे माध्यम स्वयं आत्माकी परमात्मातककी यात्रा प्रतिपादित करते हैं; परन्तु पाश्चात्य आसुरी संस्कृतिका अन्धानुकरणके कारण जबसे भोग पशुतामें और योग ‘योगा’में परिवर्तित हुए हैं, तबसे सभी दिशाहीन होकर मनमाना आचरण कर रहे हैं और उसका परिणाम हमारे समक्ष ही है कि कैसे जो जलतक प्रकृतिने हमें स्वच्छ प्रदान किया था, उसे भी बोतलमें २०-२५ रूपयोंमें क्रय करना पडता है; अतः भारतीय मूलसंस्कृतिपर चलकर ही राष्ट्र रक्षण सम्भव है ।”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : नभाटा



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