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शास्त्र वचनोंमें सकाम और निष्काम साधनाका महत्त्व


त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्वो स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्‌ ॥ – श्रीमद्भागवद्गीता (९:२०)
अर्थ : तीनों वेदोंमें विधानकिए हुए सकाम कर्मोंको करनेवाले, सोम रसको पीनेवाले, पापरहित पुरुष मुझको यज्ञोंद्वारा पूजकर स्वर्गकी प्राप्ति चाहते हैं, वे पुरुष अपने पुण्योंके फलरूप स्वर्गलोकको प्राप्त होकर स्वर्गमें दिव्य देवताओंके भोगोंको भोगते हैं ।
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्य मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं  त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना    गतागतं     कामकामा  लभन्ते ॥ – श्रीमद्भागवद्गीता (९:२१)
अर्थ : वे उस विशाल स्वर्गलोकको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं । इस प्रकार स्वर्गके साधनरूप तीनों वेदोंमें कहे हुए सकामकर्मका आश्रय लेनेवाले और भोगोंकी कामनावाले पुरुष बार-बार आवागमनको प्राप्त होते हैं, अर्थात्‌ पुण्यके प्रभावसे स्वर्गमें जाते हैं और पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आते हैं ।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्‌ ॥ – श्रीमद्भागवद्गीता (९:२२)
अर्थ : जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वरको निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभावसे भजते हैं, उन नित्य-निरंतर मेरा चिंतन करनेवाले पुरुषोंका योगक्षेम (भगवत्‌स्वरूपकी प्राप्तिका नाम ‘योग’ है और भगवत्‌प्राप्तिके निमित्त किए हुए साधनकी रक्षाका नाम ‘क्षेम’ है) मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूं ।
भावार्थ : उपर्युक्त तीनों श्लोकोंसे सकाम और निष्काम साधनाका महत्त्व स्पष्ट रूपसे ज्ञात होता है । स्वर्गलोकमें पुण्यात्माएं तभी तक रहती हैं जब तक उनके पास पुण्य कर्मोंका प्रताप होता है, वह एक प्रकारसे पञ्च सितारा विश्रामगृह (होटल) समान होता है, ऐसे एक पञ्च सितारा विश्रामगृहमें किसी व्यक्तिका सत्कार तभी तक किया जाता है जब तक उनके पास धन हो उसी प्रकार स्वर्गलोक भी है, पृथ्वी लोकमें शास्त्र अनुसार सत्कर्मोंके कारण पुण्य प्राप्त होता है और जब इसके संचयमें अत्यधिक वृद्धि होती है तब स्वर्गलोकके सुख भोगनेको मिलते हैं; किन्तु पुण्यके शेष होनेपर पुनः मृत्यु लोकमें जन्म लेना पडता है । और इस प्रकार जीवका आवागमनका चक्र पुनः आरम्भ हो जाता है । इसके विपरीत जो निष्काम भक्ति करता है उसकी आध्यात्मिक प्रगति होती है और वह ईश्वरीय कृपाका पात्र बनता है, यही पात्रता उसे मुक्ति प्रदान करती है । भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे साधकको मोक्ष ही नहीं देते अपितु साधना हेतु जो भी आवश्यक है उसकी भी वे उपलब्धतता करवा देते हैं, अर्थात् निष्काम भक्त भगवानको प्रिय होते हैं ।
   एक सरलसा सिद्धांत ध्यानमें रखना चाहिए कि जो कुछ भी पुण्य कर्म नहीं करता, उसने शास्त्रोक्त कर्तव्योंका पालन कर पुण्य अर्जित करना चाहिए । यहां ध्यान रखने योग्य तथ्य यह है कि एक साधकके लिए पाप और पुण्य दोनों ही बंधन है, पुण्य सोनेका बंधन है और पाप लोहेकी बेडी है; किन्तु हैं दोनों ही बेडियां । पुण्य अर्जित कर भी मोक्ष नहीं मिलता, मात्र स्वर्गलोक ही प्राप्त होता है और वह भी पुण्यके क्षय होनेतक ही वहांके सुखका उपभोग किया जा सकता है । इसके विपरीत साधक यदि निष्काम साधना करता है तो वह पाप, पुण्यसे परे जाता है, उसके संचित कर्म नष्ट होते हैं और उसे उसकी साधनाके अनुरूप आध्यात्मिक लोक प्राप्त होता है और वह जीव, जन्म और मृत्युके चक्रसे निकल जाता है, यही साधनाका महत्त्व है ! अनेक साधकोंके मनमें यह प्रश्न निर्माण हो सकता है कि उनसे पाप और पुण्य नहीं हो इस हेतु क्या करना होगा ? सर्वप्रथम भावनावश कुछ भी कर्म करना टालना चाहिए और जब भी कुछ भी सत्कर्म करते हों तो अकर्तापनयुक्त होना चाहिए । जब साधक शरणागत भावसे ईश्वरको प्रतिदिन अपने सर्वकर्मोंका कर्तापन अर्पण करता है तो उसके कर्मोंका फल निर्माण नहीं होता है । किन्तु यह साधनाके अति उच्च अवस्था अर्थात स्थितप्रज्ञताकी स्थितिमें ही साध्य होता है, इस स्थितिको प्राप्त करने हेतु अध्यात्मशास्त्र अनुसार साधना करना चाहिए । – तनुजा ठाकुर


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