साधनाके अवरोधक (भाग-१)


आहारदोष
     साधक जब साधना पथपर अग्रसर होता है तो अनके बार उसे अपेक्षित यश नहीं मिलता है, उसके पीछे अनेक कारण होते हैं ।
साधकको उन अवरोधोंको दूर करनेका प्रयास करना चाहिए ! तो आजसे हम ऐसे ही कुछ अवरोधोंके विषयमें जानेंगे !
      ऐसा कहा गया है, ‘जैसा खाए अन्न, वैसा रहे मन’ ! साधना करने हेतु मनका शान्त रहना अति आवश्यक है तो स्वाभाविक है कि इसके लिए आहारपर भी ध्यान देना चाहिए । साधकका आहार कैसे होना चाहिए ?, इस सम्बन्धमें कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य देखते हैं ।
 साधकका आहार सात्त्विक, सुपाच्य एवं सात्त्विक वातावरणमें, सात्त्विक व्यक्तिद्वारा बनाया हुआ होना चाहिए । स्वाभाविक है कि ऐसेमें मांसाहारका यथासम्भव त्याग करना चाहिए, अधिक खट्टे, तेल एवं मिर्च मसालेवाले भोज्य पदार्थ राजसिक या तामसिक होते हैं; अतः इनका भी सेवन अल्प प्रमाणमें करना चाहिए या नहीं करना चाहिए । बाहरका भोजन अर्थात भोजनालयका भोजन अपरिहार्य कारणोंसे ग्रहण करना हो तो ही करना चाहिए; अन्यथा उसका भी परित्याग करना चाहिए ।
 यदि सेवक भोजन बनाता है तो वह प्रतिदिन स्नान करता है क्या ?, भोजन बनाते समय वह चलचित्रके गीत इत्यादि तो नहीं गाता है, इन सब बातोंका भी ध्यान रखना चाहिए और यदि सेविका बनाती हो तो मासिकधर्मके समय उससे भोजन नहीं बनवाना चाहिए ।
      प्रारम्भिक अवस्थाके साधकके लिए साधना हेतु प्रातः कालका समय विशेषकर ब्रह्म मुहूर्तका समय बहुत ही पोषक होता है, ऐसेमें उन्हें रात्रिमें या तो थोडा अल्प एवं सुपाच्य भोजन लेना चाहिए या सर्वोत्तम होगा कि सूर्यास्तसे पूर्व ही भोजन ग्रहण कर लिया जाए । इससे प्रातःकाल निद्रा खुलनेपर आलस्य नहीं होता है एवं उदरमें भारीपन भी नहीं रहता है; अतः साधना सहज हो पाती है ।
     साधकने कभी भी भोजन ठूंस-ठूंसकर नहीं करना चाहिए, वैसे भी आयुर्वेद कहता है कि आधा पेट भोजन करना स्वास्थ्यके लिए सर्वोत्तम होता है । भोजनके समय जल भी ग्रहण नहीं करना चाहिए, प्रातः कालके आहारके समय फलोंका रस, मध्याह्नके समय छाछ एवं रात्रिके भोजनके समय जलके स्थानपर दूधका सेवन करना चाहिए । इससे मलावरोधकी (कब्जकी) समस्या नहीं होती है एवं उदर ठीक रहनेसे हमारा स्वास्थ्य भी ठीक रहता है । ऋतु, प्रदेश एवं अपनी प्रकृतिके अनुरूप भोजन ग्रहण करना सर्वाधिक हितकारी होता है, इससे साधनामें अस्वस्थ देहके कारण अवरोध निर्माण नहीं होता है । मेरा सुझाव तो यह है कि सभी साधकोंको आयुर्वेदका अवश्य ही अभ्यास करना चाहिए !
 साधना हेतु देशी गायका दूध, दही, छाछ, घी इत्यादिका प्रयोग शरीरको नीरोगी रखनेमें बहुत ही सहायक होता है; साधकके लिए सम्भव हो तो वह अवश्य ही गोपालन करें ! इससे उन्हें अपनी पूजा उपासना हेतु घी, कण्डे इत्यादि भी शुद्ध मिल सकते हैं एवं साथ ही गोउत्पादोंको अपने आहारमें सम्मिलित कर सकते हैं ।


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