साधनाके विविध दृष्टिकोण


प्रार्थना, आरम्भिक अवस्थामें शब्दजन्य होती है और साधनाकी प्रगत अवस्थामें वह नि:शब्द हो जाती है अर्थात प्रार्थनाके समय मात्र शरणागत भाव रह जाता है ।



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