समष्टि साधना सम्बन्धी दृष्टिकोण (भाग – ५)


समष्टि साधना कौन कर सकता है इस सम्बन्धमें शास्त्र कहता है –
आस्तिको निःस्पृहो योगी प्रभुकार्ये सदा रतः ।
दक्षो शान्तश्च तेजस्वी प्रभुप्रचारको भवेत् ॥

अर्थ : आस्तिक, निःस्पृह, प्रभुसे जुडा हुआ, प्रभुकार्यमें रत, दक्ष, शान्त और तेजस्वी – ऐसा प्रभुप्रचारक होता है ।
उपर्युक्त शास्त्र वचनसे यह तो स्पष्ट है कि प्रत्येक व्यक्ति समष्टि साधना नहीं कर सकता है एवं इस साधना हेतु कुछ विशेष गुण अवश्य ही होने चाहिए । समष्टि साधना करते समय भिन्न प्रकारकी अडचनोंका सामना करना पडता है; इसलिए उस साधकमें ईश्वरके प्रति अपार प्रेम होना अति आवश्यक होता है ! जैसे एक धनाढ्य कुलमें जन्मी युवती यदि अपने पतिसे प्रेम करती हो तो उसका पति यदि निर्धन हो तो भी वह आनंदपूर्वक उसके साथ रह सकती है ! यही स्थिति समष्टि साधकोंकी होती है ! ईश्वरके प्रति प्रेम ही उसे इस चुनौतीपूर्ण मार्गमें अडिग रहनेमें सहायता करती है ।
समष्टि साधनामें अनेक बार अपने घर-परिवारको त्याग कर किसी दुर्गम स्थानमें रहना पडता है जहांसे अनेक बार अपने परिजनोंको सम्पर्क करना भी कठिन होता है, इसलिए मात्र अनासक्त साधक ही यह साधना कर सकता है ।
समष्टि साधकका गुरु तत्त्व या ईश्वरीय तत्त्वसे अनुसन्धान होना चाहिए; क्योंकि इस मार्गपर पग-पगपर मार्गदर्शनकी आवश्यकता होती है । जब तक कोई साधक गुरु तत्त्व या इश्वरीय तत्त्वसे जुडा न हो, तब तक उसे मार्गदर्शन नहीं मिल पाता है और उसके प्रयासोंको यथोचित यश नहीं मिलता है; इसलिए समष्टि साधकोंने अपनी व्यष्टि साधनाके आधारको सशक्त करना चाहिए । समष्टि साधनामें पूर्णत: रत होकर साधना करनेवालेको ही यश मिलता है, उसके लिए रात-दिन, सर्दी-गर्मी, धूप-छांव कुछ भी व्यवधान उत्पन्न नहीं कर सकता है !
कार्यकुशलताके साथ ही दक्षता इस साधना हेतु अति आवश्यक गुण होता है । जो साधक जितना दक्ष होता है वह उतना ही कुशल प्रसारक भी होता है ।
समष्टि साधकका शान्त एवं तेजस्वी होना, यह कुछ लोगोंको विपरीत भाव लगता होगा किन्तु ऐसा नहीं है । समष्टि साधनामें अत्यधिक अहं निर्मूलन होता है । जब हम समाजके भिन्न व्यक्तियोंसे धर्मप्रसारके मध्य मिलते हैं तो कोई हमें दुत्कार कर भगा देता है तो कोई सम्मानपूर्वक हमसे बातें कर हमारा सत्कार करता है । अपमानजनक स्थितिमें स्वयंको शान्त रखना अति आवश्यक होता है और जब कोई हमारी स्तुति करे तो विनम्रतासे उसका श्रेय अपने गुरु या आराध्यको देना चाहिए तभी हम इस मार्गपर टिके रह सकते हैं, अन्यथा जब लोग हमारी बातोंको नहीं सुनते हैं तो निराशा आ सकती है एवं स्तुतिसे अहं बढ सकता है । ऐसी विपरीत भावमें समत्व रखनेसे ही एक दिवस स्थितप्रज्ञताकी स्थिति सहज ही साध्य हो जाती है !
समष्टि साधकमें एक आदर्श साधकके जितने गुण होते हैं, वह उतना ही तेजस्वी होता है; इसलिए समष्टि साधनाकी इच्छा रखनेवाले साधकने अपने भीतर इन सभी दिव्य गुणोंको आत्मसात करनेका प्रयास करना चाहिए, तभी वह एक कुशल समष्टि साधक बनकर शीघ्र आध्यात्मिक प्रगति कर सकता है ।



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