हमारे विवाहको चौदह वर्ष हो चुके हैं; किन्तु हम निःसन्तान हैं । हमने अनेक प्रयास किए; किन्तु हमें यश नहीं मिला है । हमारे कुछ शुभचिन्तकोंका कहना है कि हमें किसी अनाथाश्रमसे किसी बच्चेको गोद ले लेना चाहिए ?
इस सम्बन्धमें क्या आप कुछ बताना चाहेंगी ?


बहुत प्रयास करनेपर भी है सन्तान प्राप्ति न होना यह बताता है कि यह एक आध्यात्मिक कष्ट है । यदि आपके प्रारब्धमें सन्तान योग नहीं है तब तो आप यदि किसी बच्चेको गोद लेते हैं तो आप एक नूतन जीवसे अपना लेन-देन निर्माण कर रहे हैं । यदि आप साधक हैं तो ईश्वर प्रदत्त इस सन्धिका सदुपयोग साधना हेतु करके अपनी आध्यात्मिक उन्नतिकर अपना मनुष्य जीवन सार्थक करें ! यदि आप ऐसा नहीं कर सकते हैं तो आप किसी बच्चेको गोद ले सकते हैं ।
   साथ ही यह बात भी स्पष्ट करूं कि यदि अनिष्ट शक्तियोंके कारण आपको सन्तान प्राप्ति नहीं हो रही है तो जब आप किसी बच्चेको गोद लेंगे तो उसे भी निश्चित ही कष्ट होगा; अतः ऐसा न हो; इसलिए योग्य साधना स्वयं भी करें एवं अपने बच्चेसे भी कराएं अन्यथा या तो उस बच्चेको भविष्यमें कष्ट होगा, जिससे आप दुःखी रहेंगे या वह आपको कष्ट देगा, जिससे आपको दुःख होगा । इसका भी आपको एक उदाहरण देती हूं । अगस्त २०१२ में मथुरामें एक महिला हमारे प्रवचनमें आई थी । प्रवचन पश्चात उन्होंने कहा, “हमने अनेक प्रयत्न किए; किन्तु हमारे स्वयंके बच्चे नहीं हुए तो हमने एक अनाथाश्रमसे दो माहका बालक गोद ले लिया, उसे हमने बहुत लाडसे पाला; अब वह चौदह वर्षका हो गया है और उसने अपने आचरणसे हमें बहुत कष्ट देना आरम्भ कर दिया है, वह अब तो हम दोनोंको एक कक्षमें पांच-पांच घण्टे बन्द कर देता है । वह अयोग्य बातोंके लिए हठ करता है, हम यदि उसकी बात नहीं मानते हैं तो हमें वह ताने मारता है, उसे किसीने बता दिया है कि उसे हमने गोद लिया है । हम बहुत व्यथित हैं, हम समाजमें बहुत प्रतिष्ठित परिवारके रूपमें जाने जाते हैं, ऐसेमें हमें भय है कि यह हमारी प्रतिष्ठाको अपने अयोग्य आचरणसे धूलमें मिला देगा । हमें तो वह मानसिक कष्ट दे ही रहा है । इस महिलाके घरमें तीव्र पितृदोष था; इसलिए उनके अतृप्त पितर उस बच्चेके माध्यम से उन्हें कष्ट दे रहे थे । मैंने उन्हें कुछ उपाय बताए और दूसरे नगर चली गई । दो वर्ष उपरान्त एक दिवस उनसे अकस्मात पुनः भेंट हुई तो वह बहुत प्रसन्न थी, उन्होंने कहा, “अब हमारे पुत्रमें बहुत परिवर्तन है, वह स्वयंको सुधारने हेतु प्रयास करता रहता है ।”
वस्तुतः अनाथाश्रमके बच्चोंका तीव्र प्रारब्ध होता है,  तभी तो वे वहां पहुंच जाते हैं एवं उनमेंसे कुछको अनिष्ट शक्तियोंका भी तीव्र कष्ट होता है एवं अधिकांश अनाथाश्रमोंमें बच्चोंको योग्य साधना व धर्मपालन भी नहीं सिखाया जाता है; अतः ऐसे बच्चे जैसे-जैसे बडे होते हैं, उन्हें कष्ट होता है एवं  वे अपने आचरणसे अपने पालकोंको भी कष्ट देते हैं ।
हमारे दो सम्बन्धियोंको पितृ दोषके कारण बच्चे नहीं हुए थे । एकने अपने भाईके बेटेको दो माहकी आयुमें ही गोद ले लिया था और दूसरेने एक अनाथाश्रमसे एक दो वर्षके बच्चेको गोद लिया था । मैंने जब दोनों से मिली थी तो दोनोंको ही स्वयं एवं उनके बच्चेसे साधना करने हेतु कहा था ।
जिन्होंने अपने भाई के बच्चेको गोद लिया था, वे अपने मनसे कुछ साधना करते रहे और अपने बच्चेमें साधनाका संस्कार नहीं डाला, जबकि वह बच्चा बहुत तेजस्वी था । कालान्तर में उस बच्चेको भी अनिष्ट शक्तियोंके कष्टके कारण उसकी पढाई मध्यमें ही छूट गई और उसने अपने आचरणसे अपने पालकोंको बहुत कष्ट दिया ।
दूसरे सम्बन्धी जिन्होंने अनाथाश्रमसे बच्चा गोद लिया था, उन्होंने मैंने जो-जो बताया था, वह सब वे करते हैं और वे लोग उस बच्चेसे बहुत प्रसन्न हैं ।
इसलिए आप यदि बच्चेको गोद लेते हैं तो सतर्क होकर किसी सन्तकी शरणमें या अध्यात्मशास्त्र अनुसार साधना करें ।


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