केरलके उच्च न्यायालयमें, अल्पसङ्ख्यक बने रहनेके विरुद्ध दी गई याचिका


२५ जुलाई, २०२१
      केरलके उच्च न्यायालयमें एक याचिका प्रस्तुत की गई है, जिसमें निवेदन किया गया है कि मुसलमान और ईसाई कबतक अल्पसङ्ख्यक बने रहेंगे ? यह याचिका ‘सिटीजन एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेसी’के तर्क सहित, अभिवक्ता ‘सी’. राजेंद्रनके द्वारा प्रस्तुत करवाई गई है । यह संस्था साम्प्रदायिक, जाति और लिंगके आधारपर किए गए भेदभावोंके विरुद्ध प्रश्न उठाती रहती है । अभिवक्ता राजेंद्रनने कहा कि मुसलमान और ईसाई, पूर्वकी भांति अब वित्तीय, सामाजिक और शैक्षणिक स्तरपर पिछडे हुए नहीं हैं; अपितु उन्होंने हिन्दुओंको भी पीछे छोड दिया है; इसलिए इस स्थितिपर पुनः विचार किया जाना चाहिए; क्योंकि कार्यकारिणीने अभीतक राज्यकी श्रेणीमें अल्पसंख्या निर्धारित नहीं की है और यह एक संवेदनशील प्रकरण है । केन्द्र शासनको राज्योंमें इनकी स्थितिको पुनः निर्धारित करना चाहिए । व्यावसायिक, शैक्षणिक तथा वित्तीय क्षेत्रोंमें अधिक तुष्टीकरण, एक राज्यके लिए गम्भीर झटका हो सकता है और बहुराष्ट्रवाद उत्पन्न हो सकता है ।
        मुसलमानोंकी बढती जनसंख्या विश्वभरमें एक सङ्क्रामक रोगकी भांति फैल रही है । भारतमें कथित अल्पसङ्ख्यक अब बहुसङ्ख्यक हो चुके हैं और शासकीय योजनाओंका अवैध  रूपसे लाभ लिए जा रहे हैं । ऐसे तुष्टीकरणके विधानको शीघ्रतासे निरस्त किया जाना चाहिए । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : डू पॉलिटिक्स


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