कुम्भ भी बना निधर्मियोंका अड्डा, ओछी लोकप्रियताके लिए ‘सद्गुरु’ यीशु भी ले रहे हैं कुम्भकी सहायता !


फरवरी १३, २०१९


प्रयागराजमें कुम्भ चल रहा है ।  कुम्भ मेलेकी व्यापकताका ही प्रभाव है कि हिन्दुओंके साथ-साथ अन्य आस्था, मत, सम्प्रदाय और धर्मके लोग प्रत्येक ओरसे प्रयागराजमें चल रहे कुम्भ मेलेका आनन्द ले रहे हैं ।

सनातन हिन्दू धर्मके इस त्यौहारकी सबसे बडी बात है कि इसके विस्तारमें केवल हिन्दू ही नहीं वरन बडे स्तरपर यह लोगोंके आकर्षणका केन्द्र बना हुआ हुआ है । इसका सबसे उत्तम उदाहरण प्रयागराजसे आनेवाले ये चित्र हैं, जिसमें सद्गुरु यीशु आपको अपनेसे जोडनेकी प्रार्थना कर रहे हैं !

हिन्दू धर्मकी सहिष्णुताका यह एक बहुत बडा उदाहरण है । त्यौहार हिन्दुओंका, डुबकी हिन्दुओंकी, ताम-झाम हिन्दुओंका और हाथ धो रहे हैं ईश्वरके पुत्र पवित्र यीशु ! धर्म परवर्तन और प्रचारके उद्देश्यसे डाले गए ईसाई धर्मके शिविर प्रयागराजतक भी पहुंच चुके हैं और इसके लिए विकसित देशोंसे उपजी धर्म परिवर्तनकी सभ्यताएं प्रत्येक प्रकारके हथकंडे अपना रही है । कुम्भ मेलेमें ईसाई मिशनरियोंके पंडालका प्रमुख उद्देश्य यही है ।

‘सद्गुरु यीशु’ बनाकर जनताके सामने रखा जा रहा है । हिन्दू धर्मके पवित्र उपनिषदोंके श्लोकोंमें ईसा मसीहको ठूंसकर परोसा जा रहा है । धर्म परिवर्तनका यह प्रकरण धर्म परिवर्तनके लिए अपनाए जा रहे सभी हथकण्डोंमें सबसे अधिक ‘क्रिएटिव’ और हास्यास्पद तो है ही, साथ ही यह ईसाईयतके विस्तारकी पराकाष्ठाको भी दर्शाता है ।

इन पर्चोंमें ईसाई धर्मके प्रचारके लिए हिन्दू धर्म-ग्रन्थों और ब्राह्मण साहित्योंके साथ ‘मिलावटका व्यापार’ चल रहा है । इनमें दावा किया गया है कि यीशु ईश्वरके इकलौते पुत्र थे और वो सनातन सद्गुरु हैं, यदि किसीको सत्य जानना है तो उसे सद्गुरु यीशुके पास जाना चाहिए ।

ब्राह्मण साहित्योंके श्लोकोंकी नकल करते हुए श्लोंकोके मध्य लिखा गया है, “असतो मा सद्गमय अर्थात यीशु ही हमें असत्यसे पूर्ण सत्यपर ले चलते हैं; क्योंकि वे स्वयं सत्य हैं, वो ‘अहमेव सत्यः’का दावा करते हैं, जिसका अर्थ होता है सत्य मैं ही हूं ।”

मृत्योर्मा अमृतं गमय

 

 

“विचित्र है कि हिन्दुओंके सबसे बडे आस्था केन्द्रको ईसाईयोंने अपने गोरखधन्धेका अड्डा बना दिया है और उन्हें कोई भी नहीं रोक पा रहा है ! न ही अखाडे, न ही साधु-सन्यासी ! कुम्भमें सब धर्म अर्जित करने हेतु एकत्र हुए हैं और अधर्म अपने नेत्रोंके समक्ष देख रहे हैं, क्या हम ईश्वरकी कृपाके योग्य है ?”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : ऑप इण्डिया

 



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