अनेक व्यक्तियोंको लगता है कि श्राद्ध हेतु ब्राह्मणको ही भोजन क्यों करवाना चाहिए ? ब्राह्मणका अर्थ है या तो वह जो ब्रह्मज्ञानी हो या वह जो पूर्ण निष्ठासे ईश्वरीय साक्षात्कार हेतु प्रत्यनशील हो । ऐसे ब्राह्मणोंमें संकल्प शक्ति होती है जिससे समाजका हित सहज ही हो जाता है । जो भगवानका भक्त हो, जिसने मनको भगवानमें ही अनन्य भावसे लगा रखा हो, भगवानके लिए ही यजन आदि कर्म करता हो, भगवत्परायण हो और भगवानको ही अपने समस्त कर्मोंको अर्पण कर देता हो, वह ब्राह्मण संसार सागरसे पार उतरनेमें समर्थ होता है । यहां आर्थिक विपत्तिमें ग्रस्त एक महिलाके ब्राह्मण भोजनके माध्यमसे मानसिक त्राससे छुटकारेकी एक कथा दी जा रही है :–
पैठणमें एक धनी महिला थी । उसके पति धनी-मानी सज्जन थे । घरमें समृद्धि थी । इसलिए उस महिलाने सहस्र (हजार) ब्राह्मणोंको भोजन करानेका संकल्प लिया । कालचक्र परिवर्तित होता रहता है । परिवर्तित हुआ । असमयमें बेचारीका पति मर गया । घर में जो कुछ संपत्ति थी, वह भी नष्ट हो गई । अंतमें घरोंमें पानी भरकर पेट पालने लगी । जब भी वो एकांतमें होती तो उसने जो सहस्र ब्राह्मणोंके भोजन करानेका उसने संकल्प लिया था, वह उसे स्मरण हो आता । उसकी पूर्ति कैसे हो ?, यह विचारकर उद्विग्न हो जाती । किसी विद्वानने उसे बताया कि कोई ऐसा ब्राह्मण तुमको मिल जाए जो मन, वचन और कर्मसे भगवानमें लगा हो, अकेले उसीको खिला देनेसे तुम्हें सहस्र ब्राह्मण भोजन करानेका फल मिल जाएगा ।
उस समय संत एकनाथसे बढकर कोई ब्रह्मनिष्ठ तो था नहीं, इसलिए महिलाने एकनाथजीको भोजन करानेका निश्चय किया । उसने अपनी सारी दुर्व्यथा उन्हें सुना दी और यह भी कह दिया कि ‘बिना आपको भोजन कराए, हमारा हजार ब्राह्मणोंको भोजन करानेका संकल्प पूरा न हो सकेगा और संकल्पका पूरा न होना परलोकके लिए बाधक होता है ।’ एकनाथजी दयालु थे । उसका शुद्ध संकल्प और विनय देखकर उन्होंने उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया ।
दूसरे दिन अपने पुत्र हरिपण्डित को उसके यहां भोजन बनानेको भेजा । हरिपण्डितने भोजन बनाया और संत एकनाथको स्वयं ही परोस कर भोजन कराया । यह देख कर वह स्त्री अति प्रसन्न हो रही थी । एकनाथजीने हरिपण्डितसे कहा कि मेरी पत्तल तुम्हीं उठाकर फेंक दो । जब हरिपण्डित पत्तल उठाकर फेंकने लगे, तब महिला वहीं खडी थी । दोनोंने आश्चर्यके साथ देखा कि उस पत्तलके नीचे दूसरी पत्तल भी निकल आई । दूसरीके नीचे तीसरी और तीसरीके नीचे चौथी । इस प्रकार एक सहस्र पत्तलें निकलीं । इस दैवीय चमत्कारसे उस स्त्रीको पूर्ण विश्वास हो गया कि एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन करानेका उसका संकल्प पूरा हो गया । इसका दूसरा सुफल यह हुआ की हरिपण्डितको, जो अपने पाण्डित्यपर गर्व था, वह भी गल गया । वे समझ गए कि पिताजी पहुंचे हुए संत हैं और उन्होंने पिताकी शरण ग्रहणकी ।