अनुज बधू भगिनी सुत नारी । सुनु सठ कन्या सम ए चारी ।। इन्हहि कुदृश्टि बिलोकइ जोइ । ताहि बधें कछु पाप न होइ ।। अर्थ : रे मूर्ख, सुन लो ! छोटे भाईकी स्त्री, बहन, पुत्रकी स्त्री और बेटी, ये चारों एक हैं । इनकी ओर जो बुरी दृष्टिसे देखे, उसे मारनेमें तनिक भी […]
पहले विद्वता लोगोंके क्लेशको दूर करनेके लिए थी । कालांतरमें वह विषयी लोगोंके विषय सुखकी प्राप्तिके लिए हो गई। – भतृहरि
जनम मरन सब दुख सुख भोगा । हानि लाभ प्रिय मिलन वियोगा । काल करम बस होहिं गोसाईं । बरबस राति दिवस की नाईं । अर्थ : जन्म मृत्यु, सभी दुख सुखके भेाग, हानि-लाभ, प्रिय लोगोंसे मिलना या बिछुडना, समय एवं कर्मके अधीन रात्रि एवं दिवसकी भांति स्वतः होते रहते हैं । – गोस्वामी तुलसीदास
मेघ वर्षा करते समय यह नहीं देखता कि भूमि उपजाऊ है या ऊसर। वह दोनोंको समान रूपसे सींचता है। गंगाका पवित्र जल उत्तम और अधमका विचार किए बिना सबकी प्यास बुझाता है। – सन्त तुकाराम
दूसरेके उपकारका विस्मरण उचित नहीं होता; परन्तु दूसरेपर उपकारको उसी दम भूल जाना ही उचित है। – संत तिरुवल्लुवर
ऐश्वर्यका भूषण सज्जनता, शूरताका मित-भाषण, ज्ञानका शांति, कुलका भूषण विनय, धनका उचित व्यय, तपका अक्रोध, समर्थका क्षमा और धर्मका भूषण निश्छलता है। यह तो सबका पृथक-पृथक हुआ; परंतु सबसे बढकर सबका भूषण शील है। – भतृहरि
किसी कार्यको करनेसे पहले इसे करनेकी दृढ इच्छा अपने मनमें कर लें और सारी मानसिक शक्तियोंको उस ओर झुका दें। इससे आपको अधिक सफलता प्राप्त होगी। – स्वामी रामतीर्थ
मूर्ख राजा अपनी प्रजापर शासन करता है, चतुर राजा उसकी शक्ति और सार्मथ्यका लाभ उठाता है और ज्ञानी राजा उसे संतानकी भांति प्रेम करता है। – कल्हण
बन बहु विषम मोह मद माना। नदी कुतर्क भयंकर नाना।अर्थ : मोह, घमंड और प्रतिष्ठा बीहड जंगल और कुतर्क भयावह नदी हैं ! – तुलसीदास
सज्जन स्वयं ही दूसरेके हितके लिए उद्यम करते हैं, उन्हें किसीके द्वारा याचनाकी प्रतीक्षा नहीं होती। – भतृहरि