संत वाणी

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जितना हम दूसरोंके साथ अच्छा करते हैं, उतना ही हमारा हृदय पवित्र हो जाता है और भगवान उसमें बसने लगते हैं । – स्वामी विवेकानंद

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जैसे एक बछडा सहस्रों गायोंके झुंडमे अपनी मांके पीछे चलता है, उसी प्रकार व्यक्तिके अच्छे और बुरे कर्म उसके पीछे चलते हैं ।” – आचार्य चाणक्य

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शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है । एक शिक्षित व्यक्ति प्रत्येक स्थानपर सम्मान पाता है । शिक्षा, सौन्दर्य और यौवनको परास्त कर देती है । – आचार्य चाणक्य 

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जबतक आपका शरीर स्वस्थ और नियन्त्रणमें है और मृत्यु दूर है, स्वयंके आध्यात्मिक उत्थानका प्रयास कीजिए; जब मृत्यु सिरपर आ जाएगी तब आप क्या कर पाएंगें ? – आचार्य  चाणक्य

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कटा हुआ वृक्ष भी बढता है, क्षीण हुआ चन्द्रमा भी पुन: बढकर पूरा हो जाता है । इस बातको समझकर सन्त पुरुष अपनी विपत्तिमें नहीं घबराते । – भतृहरि

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बड अधिकार दच्छ जब पावा । अति अभिमानु हृदय तब आबा ।नहि कोउ अस जनमा जग माहीं । प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं ।अर्थ: जब दक्षको प्रजापतिका अधिकार मिला तो उसके मनमें अत्यधिक घमंड आ गया । संसारमें ऐसा किसीने जन्म नही लिया जिसे अधिकार पाकर घमंड नहीं हुआ हो । –  गोस्वामी तुलसीदास

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दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त ।  अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत ।  ।  – संत कबीरदास  अर्थ: यह मनुष्यका स्वभाव है कि जब वह दूसरोंके दोष देखकर हंसता है,तब उसे अपने दोष याद नहीं आते, जिनका न आदि है न अंत ।

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शुध्द अन्त:करणसे नामजप करनेसे ईश्वरीय कृपाकी अनुभूति मिलती है,  नामजपसे अन्तर्मन शुध्द होता है, नामजपके कारण ही मन अन्तर्मनमे प्रवेशकर स्थिर हो जाता है । नामजपके कारण चिंता नष्ट हो जाती है तथा साधनाकी तडप भी अपने-आप बढ जाती है – श्री अक्कलकोट स्वामी समर्थ महाराज

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देवके लिए क्या सम्भव नहीं है ? नदीपर पत्थर तैर सकता है, सूर्यकी किरणोंपर चींटियां चल सकती हैं, आगके पठारोंपर फसल उग सकती है, भीतके (दीवारके) भी पांव निकल सकते हैं और वह चल सकती है, विशाल पर्वत और छोटासा मच्छर समान हो सकते हैं । देवकी कृपासे सृष्टिमें कुछ भी असम्भव, सम्भव हो सकता […]

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जाग्रतकी अवस्था दीर्घ और स्वप्नकी क्षणिक होती है, इसके अतिरिक्त उनमें और कोई भेद नहीं है । जाग्रतमें जाग्रतकी घटनाएं जितनी सत्य दिखती हैं, उसीप्रकार स्वप्नमें स्वप्नकी घटनाएं उतनी ही वास्तविक लगती है । स्वप्नमें मन एक दूसरा शरीर धारण करता है । जाग्रत और स्वप्न दोनों ही अवस्थाओंके नाम, रूपके विचार क्रमशः आते रहते […]

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