संत वाणी

ईश्वरके अनन्त रंग व रूप


दो व्यक्ति गिरगिटके रंगको लेकर तीखा विवाद कर रहे थे । एकने कहा, “ताडके पेडपर वह गिरगिट सुन्दर लाल रंगका है ।”  दूसरे व्यक्तिने विरोध करते हुए कहा, “आप भूल कर रहे हैं, गिरगिटका रंग लाल नहीं, नीला है ।”  जब वे वाद-विवादसे हल नहीं निकाल पाए….

आगे पढें

परमात्मा मिलनेपर बाहर-भीतर पूर्णतया शान्त होता है


जब तक कोई व्यक्ति ‘अल्लाह हो अल्लाह हो’ का राग ऊंचे स्वरमें आलापता है, तब तक उसे अल्लाह नहीं मिले हैं, यह समझना चाहिए; क्योंकि जिसे अल्लाह मिल जाता है, वह तो शान्त हो जाता है ! – स्वामी राम कृष्ण परमहंस

आगे पढें

सुमिरनकी वृत्ति अंगीकृत करें


सुमिरन सो मान लाइये जैसे पानी मीन । प्राण तजै पल बिछुरै सत्य कबीर कहे दीन ।। – सन्त कबीर अर्थ : सुमिरनकी ऐसी वृत्ति अंगीकृत करें, जैसे मछ्लीका सम्बन्ध जलसे है । मछ्ली जलसे कुछ क्षणोंके लिए वियोग नहीं सह पाती है और अपने प्राण त्याग देती है । यह दीन कबीरकी सत्य वाणी […]

आगे पढें

हमारा अज्ञान ही अन्धकारका कारण


ब्रह्माण्डकी सारी शक्तियां पहलेसे हमारी हैं, वो हम ही हैं, जो अपने नेत्रोंपर हाथ रख लेते हैं, तत्पश्चात रोते हैं कि कितना अन्धकार है ! – स्वामी विवेकानन्द

आगे पढें

सन्त वाणी


देहमें मलीनता आनेके कारण : १. नेत्र : परनारीको देखना (उसे नारी नहीं ,देवी, मां या बहन स्वरुपमें देखें ) २. कान : परनिंदा सुनना ३. जिह्वा : दूसरेके दोष बताना ४. मन : विषयोंका विचार करना। – पूज्य डॉ. वसंत आठवले

आगे पढें

संतवाणी


भक्तोंद्वारा सांसरिक जगतमें आचरणमें लाने योग्य  विविध भाव १. समभाव अ. अपने समान आयुवाले व्यक्तिसे भाई अथवा बहनसा व्यवहार रखें आ  आयुमें ज्येष्ठों व्यक्तिने दूसरोंसे  पुत्रसा व्यवहार करें । इ  छोटे बच्चोंके साथ  छोटे बच्चों समान  व्यवहार करें । २. आत्मीय भाव :सभीके लिये आत्मीय भाव हो। अर्थात  सबसे  जैसे स्वयंसे प्रेम करते हैं वैसी […]

आगे पढें

संस्कृत भाषाका अनादर करनेवाले भारतीयोंका घोर अधःपतन !


भारतीयोंका प्राचीन वाङ्मय एवं कला जाननेकी उत्कट इच्छा जर्मनीमें है; किंतु भारतके कर्इ व्यक्तियोंको संस्कृतका कुछ भी ज्ञान नहीं है । – परम पूज्य डॉ. काटे स्वामी

आगे पढें

आस्तिक होते हुए भी जो साधना न करे वह नास्तिकसे बुरा है – परम पूज्य भक्तराज महाराज


भावार्थ : किसी रोगकी औषधि ज्ञात होते  हुए भी उसे न लेना अधिक अयोग्य है | अस्तिकको ईश्वरके अस्तित्वका ज्ञान होते  हुए भी उसकी प्राप्ति हेतु साधना न करना, यह नास्तिकसे अर्थात  जिसे ईश्वरके अस्तित्वपर ही विश्वास नहीं, उससे भी अधिक बुरा है । जिसने अपने ज्ञानका उपयोग नहीं किया वह, अज्ञानीसे अर्थात नास्तिकसे अधिक […]

आगे पढें

अन्तर्मनके षडरिपु नष्ट होनेपर ही आध्यात्मिक प्रगति संभव है !


माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर । कर का मन का डा‍रि दे, मन का मनका फेर॥  – सन्त कबीर अर्थ : यदि अपने स्वभावदोष और अहंके लक्षण दूर करने हेतु सतर्कतासे प्रयास न किया जाये तो सम्पूर्ण जीवन माला फेरने पर भी कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता ! अतः साधकको  दोषोंका […]

आगे पढें

कबीर वाणी


हरी किरपा तब जानिए दे मानव अवतार गुरु किरपा तब जानिए मुक्त करे संसार अर्थ : यदि मनुष्य देहकी प्राप्ति हुई है तो उसे ईश्वरकृपा समझें और यदि इस भवसागरसे मुक्त हो गए तो उसे गुरुकृपा जानें !

आगे पढें

© 2017. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution