संत वाणी

सन्त वाणी


निश्चयके बलसे ही फलकी प्राप्ति होती है । – सन्त तुकाराम

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अग्नि उसीको जलाती है जो उसके पास जाता है; परन्तु क्रोधाग्नि सारे कुटुम्बको जला डालती है। – संत तिरुवल्लुवर

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ज्ञाताज्ञात पाप ही अंत:करणकी मलिनता है । जब तक अंत:करण मलरहित, पापरहित नहीं होगा, तब तक वास्तविक दृष्टिका उदय नहीं होगा । – आदिगुरु शंकराचार्य

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सन्त वाणी


बन बहु विषम मोह मद माना। नदी कुतर्क भयंकर नाना।अर्थ : मोह, घमंड और प्रतिष्ठा बीहड जंगल और कुतर्क भयावह नदी हैं ! – तुलसीदास

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जितना हम दूसरोंके साथ अच्छा करते हैं, उतना ही हमारा हृदय पवित्र हो जाता है और भगवान उसमें बसने लगते हैं । – स्वामी विवेकानंद

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संत वाणी


जैसे एक बछडा सहस्रों गायोंके झुंडमे अपनी मांके पीछे चलता है, उसी प्रकार व्यक्तिके अच्छे और बुरे कर्म उसके पीछे चलते हैं ।” – आचार्य चाणक्य

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शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है । एक शिक्षित व्यक्ति प्रत्येक स्थानपर सम्मान पाता है । शिक्षा, सौन्दर्य और यौवनको परास्त कर देती है । – आचार्य चाणक्य 

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जबतक आपका शरीर स्वस्थ और नियन्त्रणमें है और मृत्यु दूर है, स्वयंके आध्यात्मिक उत्थानका प्रयास कीजिए; जब मृत्यु सिरपर आ जाएगी तब आप क्या कर पाएंगें ? – आचार्य  चाणक्य

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कटा हुआ वृक्ष भी बढता है, क्षीण हुआ चन्द्रमा भी पुन: बढकर पूरा हो जाता है । इस बातको समझकर सन्त पुरुष अपनी विपत्तिमें नहीं घबराते । – भतृहरि

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सन्त वाणी


बड अधिकार दच्छ जब पावा । अति अभिमानु हृदय तब आबा ।नहि कोउ अस जनमा जग माहीं । प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं ।अर्थ: जब दक्षको प्रजापतिका अधिकार मिला तो उसके मनमें अत्यधिक घमंड आ गया । संसारमें ऐसा किसीने जन्म नही लिया जिसे अधिकार पाकर घमंड नहीं हुआ हो । –  गोस्वामी तुलसीदास

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