सत्यके कोषकी शोधमें (खोजमें) मैं ब्रह्माण्डमें भटका; परन्तु मैंने इसे मेरे भीतर ही पाया । – सन्त नामदेव
पुराणोंमें आपको ईश्वरकी अनुभूतिका मार्ग मिल जाएगा; परन्तु उस मार्गकी सभी जानकारी प्राप्त करनेके पश्चात आपको उसपर कार्य करना आरम्भ करना होगा, तभी आप लक्ष्यतक पहुंच सकते हैं – स्वामी रामकृष्ण परमहंस
जैसे ही मन अधिकाधिक अन्तर्मुखी होता है, यह भौतिक इच्छाओंसे उतना ही मुक्त होता जाता है और जब मन इच्छाओंसे पूर्णतया विमुख हो जाता है तो आत्मज्ञानकी राह, सभी प्रकारकी बाधाओंसे मुक्त हो जाती है – आदिगुरु शंकराचार्य
जैसे ही सांसारिक विचार उदित होते हैं, उन्हें उनके जन्म स्थानपर बिना चिह्न छोडे नष्ट कर देना वैराग्य है । जिसप्रकार एक गोताखोर अपने कटिपर (कमरपर) एक पत्थर बांधे समुद्रके तलपर तैरता है तथा वहांसे मोती प्राप्त करता है, उसीप्रकार हममेंसे प्रत्येकको वैराग्यकेद्वारा अपने स्वयंके भीतर गोता लगाना चाहिए और आत्मा रूपी मोती प्राप्त करना […]
संसारमें ऐसे लोग थोडे ही होते हैं, जो कठोर; किन्तु हितकी बात कहनेवाले होते हैं । – महर्षि वाल्मीकि
कटु वचन दूसरेके मर्म स्थानपर चोट करते हैं और बदलेमें वह श्राप देता है, जो निष्फल नहीं जाता ! – महर्षि वेदव्यास
शुद्ध रूपमें धारण की गई एकमात्र वाणी ही मनुष्यकी शोभा बढाती है, शेष सब आभूषण सदैव नष्ट होते रहते हैं, केवल वाणी रूपी आभूषण ही सच्चा आभूषण है – भर्तृहरि जी महाराज
साधन भक्तिके प्रभावसे मनुष्य क्या नहीं कर सकता ?, अर्थात सब कुछ कर सकता है । विशुद्ध भक्ति और भगवच्चरणारविन्दमें उत्कट प्रेम होनेपर मनुष्यमें दैवी ऐश्वर्य प्रकट होने लगता है । जो व्यक्ति केवल परमेश्वरको ही अपना सर्वस्व (सर्वेसर्वा) समझता है, वह असम्भवसे असम्भव कार्यको सम्भव कर देता है – धर्मसम्राट करपात्रीजी महाराज