अवधि : अनुलोम-विलोम प्राणायाम पहले दोसे तीन मिनिट करना चाहिए और कुछ समयतक इसका अभ्यास हो जानेपर इस व्यायामको प्रति दिन आधे घण्टेतक किया जा सकता है । अनुलोम-विलोमको बिना रुके तीन मिनिट या उससे अधिक समयतक निरन्तर करना हानिकारक हो सकता है, इसलिए प्राणायामके मध्य थोडा विश्राम लेना न भूलें ! अनुलोम विलोमके समय […]
गति : अनुलोम-विलोम प्राणायामकी श्वसन-गति अधिक तीव्र करनेपर शरीरके प्राणकी गति भी तीव्र हो जाती है । आरम्भिक अवस्थामें अनुलोम-विलोम प्राणायाममें एक नासिकासे पूर्ण रूपसे श्वास भीतर लेनेमें २.५ सेकेण्ड और पुनः श्वास बाहर निकलनेमें २.५ सेकेण्डका समय लगता है । इस प्रकार अनुलोम-विलोमकी एक प्रक्रिया लगभग ५ सेकेण्डमें पूरी हो जाती है । इसी […]
अनुलोम-विलोम प्राणायाम कब करें ? समय : अनुलोम-विलोम प्राणायाम प्रातःके समय सूर्योदयके पहले करना अति गुणकारी होता है । इस व्यायामको करनेसे पहले पेट खाली कर लेना चाहिए । अनुलोम-विलोम भोजन या अल्पाहार करनेसे पहले ही करना चाहिए । अनुलोम-विलोम कर लेनेके पश्चात एक घण्टेके पश्चात ही कुछ खाना चाहिए । अनुलोम-विलोम सन्ध्याके समय भोजन […]
अनुलोम-विलोम ‘प्राण+आयाम’से प्राणायाम शब्द बना है । प्राणका अर्थ जीवनी शक्ति है, किन्तु इसका सम्बन्ध शरीरान्तर्गत वायुसे है, जिसका मुख्य स्थान हृदयमें है । व्यक्ति जब जन्म लेता है तो गहरी श्वास लेता है और जब मरता है तो पूर्णतः श्वास छोड देता है । तब सिद्ध हुआ कि वायु ही प्राण है । आयामके […]
कर्करोग (कैंसर) : गेहूंके जवारे, द्राक्ष (अंगूर), मुनक्का, चुकन्दरका रस पिएं ! अदरकका रस वर्षभर आधा चम्मच एक कप पानीमें लेनेसे, कभी भी गलेका कर्करोग नहीं होगा । पत्तागोभी, फूलगोभी, लहसुन, ‘प्याज’, नारंगी (सन्तरा), चकोतरा, नींबूका रस अच्छी मात्रामें लें ! रोग प्रतिरोधी क्षमताके लिए : सन्तरेका रस लें ! आधे सिरमें पीडा (माइग्रेन) : […]
कुछ रोग और उनके लिए विशिष्ट रस मधुमेह (डायबिटीज) : लौकीका रस पिएं ! थोडा पानी, ‘काला नमक’, काली मिर्च और तुलसीके पत्ते भी इसमें डालें ! बनानेके उपरान्त तुरंत पिएं ! प्रशीतकमें (फ्रिजमें) न रखें ! सिरकी वेदना : प्रातः तरबूजका रस निकालकर उसमें ‘काला नमक’ डालकर पीनेसे स्थायी लाभ होता है । रक्तचाप […]
रस-चिकित्साके लाभ * रस-चिकित्सासे अनेक रोगोंका प्रतिकार किया जा सकता है । * कोई भी रोग होनेपर अशक्तता (कमजोरी) बढ जाती है, जिसमें भोजन सरलतासे खाया या पचाया नहीं जा सकता है, ऐसेमें हम रस चिकित्साको सरलतासे उपयोगमें ला सकते हैं, जिससे शारीरिक व मानसिक अशक्तताको दूर किया जा सकता है । * जिन खाद्य […]
फल या रस चिकित्सा अर्थात फलों, मूलों, तनों, पत्तियोंके रसाहारद्वारा चिकित्सा । रस चिकित्सा एक ऐसी पद्धति है, जिसका कोई प्रतिकूल या अवाञ्छित प्रभाव (साइड इफेक्ट) नहीं है । रोगोंसे लडनेके लिए रसका उपयोग औषधिके समान किया जाता है । फलों और तरकारियोंमें जो पोषक तत्त्व पाए जाते हैं, वे हमें रोगोंसे प्रतिकार करनेकी शक्ति […]
रोगके पूर्णतः अथवा किसी-किसी दशामें अंशतः ठीक हो जानेपर तक्रकल्प (छाछ, मट्ठा) आरम्भ करना चाहिए । रोगीको आरम्भमें कुछ दिनोंतक फल और तरकारीपर (सब्जियोंपर) रहना चाहिए, उसके पश्चात २ से ४ दिनोंका उपवास करना चाहिए । उपवासके दिनोंमें केवल नींबूका रस जलमें मिलाकर लेना चाहिए और प्रतिदिन गुनगुने पानीका ‘एनिमा’ लेकर पेटको स्वच्छ कर लेना […]
मुखमें छाले : मुखमें छाले आ गए हों तो रातको सोते समय छालोंपर दूधकी मलाई लगानेसे छाले ठीक हो जाते हैं । प्रातः खाली पेट गायके दहीके साथ पका हुआ छींटेवाला (चित्तीदार) केला खानेसे भी मुंहके छाले ठीक हो जाते हैं । मलबन्ध (कब्ज) : यदि मलबन्ध (कब्ज) हो तो लोग कहते हैं कि तब […]