अर्शरोग (बवासीर) : ★ १० जायफलको देशी घीमें इतना सेके कि वह सूख जाए । इसे पीस-छानकर इसमें दो कप गेहूंका आटा मिलाकर, घीमें पुनः सेकें और शर्करा मिलाकर रखें ! इसे १ चम्मच प्रतिदिन प्रातःकाल खाली पेट खाएं ! इससे अर्श अर्थात बवासीरसे छुटकारा मिल जाता है । ★ जायफलके बीजोंकी गिरी २५ ग्राम […]
६. शीत प्रकोप (सर्दी-जुकाम) : ★ जायफलको जलमें घिसकर लेप बना लें ! इस लेपको नाकपर, नथुनोंपर और छातीपर मलनेसे शीघ्र लाभ मिलेगा । जायफलका चूर्ण और सोंठके चूर्णको समान मात्रामें मिलाकर एक चौथाई चम्मच २ बार खिलाएं ! इससे ‘सर्दी और जुकाम’का रोग दूर हो जाता है । ★ जायफलका पिसा हुआ चूर्ण, एक […]
१६. दुर्बलता : जायफल और जावित्री १०-१० ग्राम और अश्वगन्धा ५० ग्राम मिलाकर पीस लें ! एक-एक चम्मच प्रातः व संध्यामें दूधके साथ नियमित लें ! १७. व्रण (घाव) : जायफलके तेलका लेप बनाकर घावपर लगाएं ! इससे घावमें लाभ पहुंचेगा । १८. दांतके कीडे : जायफलके तेलको दांतोंके नीचे रखनेसे दांतके कीडे मरते हैं […]
जायफल रुचि उत्पन्न करनेवाला, जठराग्नि प्रदीपक, कफ तथा वायुका शमन करनेवाला है । जायफल जितना वयस्कोंके लिए हितकर है, उतना ही बालकोंके लिए भी हितकर है । यह हृदयरोग, अतिसार (दस्त), खांसी, वमन, शीतप्रकोप आदिमें लाभदायक है । जायफल मूत्र लानेवाला, दुग्धवर्धक, नींद लानेवाला, पाचक व पौष्टिक होता है । भारमें हलके, शुष्क, कनिष्ठ और […]
धारोष्ण दूध : धारोष्ण दूध वह होता हैं, जो स्तनोंसे तुरन्त निकाला गया दूध होता हैं । धारोष्ण दूध अत्यन्त उपयोगी होता है । सामान्य दूधको वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाशका स्पर्श होता है । थोडी देर पश्चात ऐसे दूधको पीनेसे दूधके अधिकांश गुण नष्ट हो जाते हैं । दूध निकालते ही तुरन्त पी लिया […]
इसमें सन्देह नहीं है कि ज्यों-ज्यों हमारा आहार सम्बन्धी ज्ञान बढता जा रहा है, त्यों-त्यों हमारे आहारमें होनेवाली चूकोंके साथ-साथ कई छोटी-बडी व्याधियां भी उत्पन्न होती जा रही हैं । यदि भोजनमें थोडा सुधार कर लिया जाए एवं प्राकृतिक चिकित्साका आधार लिया जाए तो कई रोगोंका निवारण भी हो सकता है एवं हम नीरोगी रह […]
* चन्द्र और सूर्य स्वरोंका सही अभ्यास करनेवाले साधकको भविष्य ज्ञानकी अनुभूति होने लगती है । क्रोध एवं कामको प्रेम एवं ब्रह्मचर्यमें रूपान्तरण करनेकी क्षमता प्राप्त होने लगती है । भविष्यमें होनेवाली घटनाओंका उसे पूर्वाभ्यास होने लग सकता है । * यदि किसी व्यक्तिका अकेला चन्द्र स्वर ही दिन-रात चलता है तो उस व्यक्तिकी मृत्यु […]
असाध्य रोगोंके रोगियोंके उपचारमें स्वर परिवर्तनके साथ अपने आराध्यका या रोग निवारण निमित्त विशिष्ट मन्त्रका जप करनेसे अच्छे परिणाम आते हैं; क्योंकि कष्टका कारण मात्र शारीरिक नहीं, वरन आध्यात्मिक भी होता है । जपकी तरंगोंके प्रवाहसे न केवल आसपासका वातावरण ही शुद्ध होता है; अपितु रोगीके स्वरका भी शोधन होने लगता है, जिससे उसके स्वास्थ्यमें […]
स्वरोंसे रोगोपचार हम आपको पिछले दो अंकोंमें बता ही चुके हैं कि स्वर चिकित्सा सहज, सरल, पूर्णतः निर्दोष, सर्वत्र उपलब्ध, सर्वकालिक, पूर्णतः वैज्ञानिक, स्वावलम्बी, अहिंसक, बिना किसी औषधि एवं वैद्यके स्वस्थ बनानेवाली, प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति है, जिससे बिना किसी दुष्प्रभाव न केवल अच्छा स्वास्थ्य; अपितु जीवनकी विविध समस्याओंका समाधान भी प्राप्त किया जा सकता है […]
स्वरको तत्त्वोंके आधारपर विभाजित भी किया गया है । प्रत्येक स्वरका एक तत्त्व होता है । यह इडा या पिंगलासे (बाईं अथवा दाईं नासिका) निकलनेवाले वायुके प्रभावसे नापा जाता है । * श्वासका दैर्घ्य १६ अंगुल हो तो पृथ्वी तत्त्व, * श्वासका दैर्घ्य १२ अंगुल हो तो जल तत्त्व, * श्वासका दैर्घ्य ८ अंगुल हो […]